विशेष रुप से प्रदर्शित

आइये समृद्ध होकर भारत को समृद्ध करें!

“किसी भी युद्ध में, पृथक-पृथक मोर्चों पर कुशलतम योद्धाओं को भी एक-एक कर लड़ने भेजने पर केवल वीरगति ही दिलाई जा सकती है…. विजयश्री का वरण नहीं किया जा सकता! विजय पाने कुशल / अकुशल योद्धाओं की टुकड़ी को, योजनाबद्ध तरीके से साथ मिलकर एक के बाद एक मोर्चे पर संगठित आक्रमण करना होता है”
विचार करें ….  आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है… तय हमें करना है कि हम अलग-अलग प्रयासों को मरते देखना चाहते हैं…,  जिसमें किसी को किसी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होनी है …., या एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ चलकर,  हिन्दी को और हिन्दुस्तानी भाषाओं को सशक्त करने में योगदान करना है!….

आइये समृद्ध होकर भारत को समृद्ध करें!!!

(नव-आकर्षक  योजनाओं  व अद्यतनों के साथ पुनर्निवेदित…)

  • आपकी तरह या हर सामान्य भारतीय की तरह ही “मैं भारत हूँ!”
  • मैं; सत्यार्चन- अन्याय, अनीति, अनाचार, अत्याचार, असत व अनर्गल के विरुद्ध आजीवन आंदोलनरत एक भारतवासी हूँ!

 

  • राष्ट्रवादी सुझाव युक्त हिंदी-लेखन के लिये, 2010 में, अंतर्राष्ट्रीय संस्था  “सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल ” द्वारा “राष्ट्रीय रतन अवार्ड” हेतु नामाँकित हुआ.

 

    • मैं, फेसबुक, ट्विटर से जागरण जंक्शन तक सोशल मीडिया पर सक्रिय, वास्तविक राष्ट्रवादी,  पाठक, विचारक, योजनाकार, जागरूकता का प्रचारक कार्यकर्ता, यथार्थवादी लेखक, ‘दैनिक तिरंगा भारत’ का सम्पादक तथा “इंडियन जर्नलिस्ट फार इंडियन पीपुल” की म.प्र. इकाई का अध्यक्ष हूँ.
    • मेरी ही तरह,  भारत, हर भारतवासी का है , हर किसी के चिंतन में भारत का होना स्वाभाविक है.
    • इसीलिए आप कलम के जादूगर हों, माहिर खिलाड़ी हों या सिखाड़ी ही हों  …. आपके सीने की आग को बाहर निकालने हेतु यहाँ “लेखन हिन्दुस्तानी” पर आप सबका स्वागत है !
    •  हालाँकि; सभी अपने अपने तरीके से अपने ब्लॉग आदि पर देश के प्रति अपनी चिंता / अपने कर्त्तव्य का प्रदर्शन करते रहते हैं जिससे कई बार एक ही तरह के विचार लगभग एक जैसे शब्दों में कई अलग ब्लॉगों पर मिल जाते हैं. इसीलिये विचारणीय है कि  “किसी भी युद्ध में, पृथक-पृथक मोर्चों पर कुशलतम योद्धाओं को भी  एक-एक कर लड़ने भेजने पर  केवल वीरगति ही दिलाई जा सकती है…. विजयश्री का वरण नहीं किया जा सकता!  विजय पाने कुशल / अकुशल योद्धाओं की टुकड़ी को, योजनाबद्ध तरीके से साथ मिलकर संगठित आक्रमण से एक के बाद एक हर मोर्चे पर जीत दर्ज की जा सकती है!

    http://wp.me/p4TEDf-p
    स्थापित और गुमनाम, दोनों, कलमकारों को आह्वान ….
    (चित्र – गूगल से साभार…)
  • विचार करें ….  आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है… तय हमें करना है कि हम अलग-अलग प्रयासों को मरता देखना चाहते हैं…,  जिसमें किसी को किसी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होनी है …., या एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ चलकर,  हिन्दी को और हिन्दुस्तानी भाषाओं को सशक्त करने में आपसी योगदान देकर साथ साथ आगे बढ़ना है?
  • साहित्य समृद्ध हुआ तो राष्ट्र समृद्ध होगा ! यदि कर्तव्य निर्वहन का श्रीगणेश करना है तो …. अनुरोध है कि,  देश हित में https://lekhanhindustani.com/ को  ही/ भी ‘आपका अपना’ ‘लेखन-मंच’  मानें और संकल्प ले सहयोग करें  ……अपनी कलम के जादू या अनाड़ीपन पर विचार किये बिना,  आपकी अपनी शैली में,  भाषायी सेवा के लिए, आपकी सर्वोत्तम (नई या पुरानी) ब्लॉग-पोस्ट को इस निवेदन के टिप्पणी / प्रतिक्रिया खण्ड में चिपकायें, ( या उसका संक्षिप्त विवरण सहित शीर्ष लिंक यहां चिपकायें !)  या सीधे इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया के रूप में ही लिखें /चिपकायें!
  •  सभी उद्गार आपके ब्लॉग पते के उल्लेख सहित प्रकाशित होंगे!
  • 1 सितम्बर 2017 से “लेखन हिन्दुस्तानी” (वर्डप्रेस बिज़नेस ब्लॉग में बदलकर) समूह ब्लॉग होने जा चुका है… अब सभी उपयुक्त प्रेषक रचनाकारों को लेखन हिन्दुस्तानी के लेखक वर्ग में भी सम्मिलित किया जा सकेगा!
  •  इनमें से सर्वश्रेष्ठ रचनाकार को मासिक, त्रैमासिक व वार्षिक सम्मान-निधि एवं सम्मान-पत्र से सम्मानित किया जायेगा!  (विस्तृत विवरण केवल प्रेषक के मेल पर भेजा जायेगा!)  इससे हमारे माध्यम से आपको बिना कुछ भी खोये , निःशुल्क प्रकाशन व हमारी साइट के किये जा रहे प्रोमोशन के लाभ सहित, प्रतिष्ठा लाभ भी  प्राप्त होगा!!!
  • आपके सुझाव, शिकायत व पोस्ट के लिए प्रतिक्रिया/ टिप्पणी/ रिएक्शन  विकल्प का प्रयोग कीजिये !
  • योगदान अपेक्षित एवं वांछनीय है !
  •  शुरुआत कीजिये आज ही ! अभी! प्रतीक्षा रहेगी….
विशेष रुप से प्रदर्शित

ज़िद है जिद

   जिद है जिद…..

Image

दोस्तो:

हम हिन्दी हमारी संस्कृति के प्रति इतने कृतघ्न हो चुके हैं

कि हम हमारे  संस्कारों के उपहास में

स्वयं भी ना केवल सम्मिलित ही हैं

वरन अपने ही उपहास पर

अट्टहास किए जा रहे हैं!!!!!!

.

वे जो षणयंत्रकारियों के चंगुल में

असहायता-वश जा फँसे हैं या अविवेक-वश

उन्हें भी हाथ बढ़ाकर वापस खींचने का दायित्व

आप-हम संस्कारी भारतीयों का ही है!

पहला कदम बढ़ाने से पहले

आवश्यक है कि ‘हम-सब’

जागृत-जन एक साथ

हाथों में हाथ लेकर

कदम से कदम मिलाकर

साथ-साथ बढ़ें!!!

.

इसीलिए आव्हाहन और अनुरोध है

हर उस  सच्चे ‘हिन्दी-जन’ से

जिसे अपने हिन्दी होने पर गौरव हो!

जो अपने समस्त व्यतिगत, जातिगत, सामाजिक, राजनैतिक, क्षेत्रगत, अनुरागों से

राग-द्वेषों से  निष्पृह रह

हिन्दी के प्रति अपने दायित्व की प्रतिपूर्ति में

जो बन पड़े कर सके, करे!

यथा-

जो लेखन में हैं

अपनी दृष्टि में अपनी सर्वोत्तम रचना भेजें,

या आपको किसी अन्य की कोई रचना प्रशंसनीय और पठनीय लगी हो

उसके ‘कापी राइट उल्लंघन’ से सुरक्षित रहते हुए

उसके संपादक / प्रकाशक आदि के उल्लेख के साथ हमें भेजें!

हिंदी लेखन से जुड़े अनेक ऐसे विशिष्ठ विचारक भी हैं

जिन्हें उचित अवसर, मंच या प्रायोजक मिलने शेष हैं

वे अपनी कृतियाँ हमें इस पोस्ट पर टिप्पणी  के रूप में भेजें!

समस्त स्थापित / अस्थापित ब्लाँग लेखन से संबद्ध जन, अपनी श्रेष्ठतम कृति के साथ (केवल लिंक अस्वीकार्य कृति आवश्यक रूप से संलग्न हो) अपने ब्लाँग का लिंक भेजें और हमारी ‘अनूठी प्रायोजन योजना’ का लाभ उठायें!

जि़द़ है…. अब हिंदी, हिंद, हिंदुस्तानी हित की…. ज़िद़ है….

चलन

मिट्टी के तन में
सोने सा मन है!
आँसु के मोतियों से
सजा क्यों बदन है?
दूर से दिखती सुहानी
यही दुनियाँ का चलन है
-सत्यार्चन

सत दर्शन!

सत दर्शन!

⬆💐🙏🏽💐⬆

⬆💐🙏🏽💐⬆
सत्य की दर्शनाभिलाषा जिनके मन में हो उनका सत्य से साक्षात्कार सुनिश्चित है!
जिन्हें सत्य की सात्विकता के विचार मात्र से बदहजमी हो जाती है वे आजीवन आडम्बर जीते हैं … आडम्बर बाॅंटते हैं तो कुछ और कैसे पा लेंगे? यानी उनको प्राप्ति भी तो आडम्बर ही होगी ना… इनकी खुशी भी वैसी ही होती है… अवास्तविक ! केवल बाहरी दुनियां को दिखाने के लिए….! अंदर सब खाली…!
जबकि सतपथ के सत्पथिक के जीवन में कुछ भी अवास्तविक नहीं होता…!
चयन आपका!
आखिर…
जीवन है आपका!!
-सुबुद्ध

शुभविजयदिवस!

शुभविजयदिवस!

राम,रावण, राम राज्य व सोने की लंका सभी आदर्श/निकृष्ट प्रतीक!

ठूंठा धोबी के कटु तथा निंदनीय शब्दों पर भी उसे कोई सजा नहीं दी  श्रीराम ने! सपत्नीक स्वयं भुगती… भूल की?

रामराज्य में

‘श्रीराम की भूल सुधारने’ (?) हम सभी रावण नहीं बन बैठे हैं?

अनचाहा बोलने वाले की बोलती बंद करने उतारू होकर!

-सुबुद्ध

कृष्ण या सुदामा?

कृष्ण या सुदामा?

जाने कब से आंखें नीर हीन हो चुकी थीं…! जाने क्या क्या बीत गया … जाने क्या क्या छूट गया… मगर आंखों में आंसू ना आये थे वर्षों बीत चुके थे पत्थर हुए… !
अचानक श्री कृष्ण-सुदामा मिलन का  वीडियो क्लिक किया… और अपने आपको वीडियो में दोनों ओर देख… निरंतर भावविह्वलता में अश्रुधार चल निकली… समाप्त होने पर भी रुकने तैयार नहीं … बाॅंध जो टूट गया था आज…! श्रीकृष्ण और सुदामा; मुझे दोनों में, मैं ही दिखते रहे…
लोकोपहास से तो अब कभी असहजता नहीं होती …. आदत जो हो गई है…. मुझे हर बार पता होता है कि जरा सी देर में द्वारकाधीश दौड़े चले आने वाले हैं… और लोकदृष्टि पलक झपकते बदल जाने वाली है… कोई आज की बात तो है नहीं…  कब से देखते आ रहा हूं…. एक-दो बार नहीं बार बार… हजार बार….  निराशा में कदम वापस मोड़ने से पहले श्रीकृष्ण दौड़े चले आये हैं… 
महल में बैठा हुआ अन्दर वाला ‘मैं कृष्ण’ भी जानता हूं… कि अपने वैभव के मान के उबाऊ बोझ से मुक्त कराने किसी भी दिन….  किसी भी पल द्वारपाल आकर…  शायद बस अभी अभी आकर मुझे मेरे बचपन के उच्छृंखल, बेतकल्लुफ़ आल्हादमय पलों   में ले जाने का कारण बनने….   सुदामा के आगमन की सूचना देने ही वाला है…  मुझे उबाऊ जीवनचर्या से सस उबारने ही वाला है… सुदामा को मेरा उल्लास लौटाने का माध्यम बनना ही था ….  आना ही था…!
‌मित्रों में ना मांगना पड़ता है…. ना बोलना …. बस उसकी जरूरत पता चल जाती है…! फिर कौन कृष्ण कौन। सुदामा पता ही नहीं चलता…. बस मित्र को मित्र की आवश्यकता का भान हो जाता है और मित्र दसियों कोस से चलकर…. दाता होकर भी याचक बनकर वो  देने आ ही जाता है…  जो मुझे चाहिए…. मैं पा लेता हूँ ….  जो मेरा अभीष्ट है…. साधिकार पाता हूॅं…  ना तो मैं उस प्राप्ति का मूल्यांकन करना चाहता हूं ….. ना कर सकता हूं….  ना चुकाने की सोचता हूँ… ना ही चुकाने में सक्षम हूँ… ना ही चुका सकता हूं….  किन्तु उसकी आवश्यकता योग्य जो हो सके करने का प्रयास अवश्य  कर सकता हूँ… करता हूँ…
‌वास्तव में कृतज्ञ तो मैं हो रहा होता हूँ …. और कृतज्ञता वो ज्ञापित कर रहा होता है ….
यही तो लीला है…. मित्रवत्सल परममित्र लीलाधर की … जो किसी किसी के ही पल्ले पड़ पाती है….!
नटखट-नटनागर-मुरलीधर-किशन कन्हैया की अमिट स्मृति अनायास सजीव अवतरित हो उठी है….
हरि ॐ!
-सुबुद्ध !

ऐ किसान हो तेरा सम्मान!

तेरे मोल का नहीं…. अब तक कोई अनुमान—

ऐ किसान! 
हो तेरा सम्मान!

बाकी के सब बिक गये

तेरे मोल का नहीं

अब तक कोई अनुमान —


एक तू ही शेष सन्मार्ग पर
तू ही शेष महान !


ना रिश्वतखोरी से तेरा नाता
ना कोई छल ही तुझे भाता


तेरी मेहनत ही तेरा अभियान!
बाकी के सब बिक गये….


तेरे मोल का नहीं

अब तक कोई अनुमान—


तू ही है वह सतपथिक
श्रम जिसका अभिमान!
हो तेरा सम्मान!
तू ही एक महान!


तू संघर्षरत प्रति दिन
हर दिन तेरा प्रयास

हर दिन जय पराजय !
तेरे धीरज को प्रणाम!


तेरे साहस को मेरा नमन !
हों सच्चे तेरे अनुमान!
रहें सफल तेरे अभियान!
हो फलीभूत तू

तब होंगे हम निहाल


तू तो होने ना देगा

भूख से बेहाल!


तेरी उपज के मोल को

सदा मिले वाज़िब मान!


ऐ किसान!

तुझे भी मिले

तेरा वांछित सम्मान!


सत्य अर्चन

चेहरे!

चेहरे!

चेहरा,
चेहरे पर चढ़ाने
चुन लीजिए
चाहे जैसा….
एक ना एक दिन
दिख ही जाना है
वैसा…
है जैसा !

चेहरे!

जयति जय जय मां

जयति जय जय मां!

आज शारदीय नवरात्रों के शुभारंभ पर सबको शुभकामनाएं!
मैं भी व्रती हूँ! सन्मार्गी हूँ! सदैव रहना चाहता हूँ!
*सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:*
*सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दु:खभाग्भवेत!*
*अर्थात सभी सुखी हों सभी रोगमुक्त हों सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें! किसी को भी दु:ख का भागी ना बनना पड़े!*
पूरी तरह सच्चे मन से… व निरपेक्ष रहते हुए उपरोक्त श्लोक के मूलभाव के उद्देश्य को मन में धारण रखते हुए…


*अंतर्चेतना में उद्घाटित कुछ नव संदेश सबसे साझा करना चाहता हूँ!*
हम हमारी मानवीय संस्कृति के संरक्षक बनें! मानवता के अनुसरणकर्ता हैं तो समझ लें..   कि “वर्तमान सत के स्थापित होने और असत के विस्थापन का चल रहा है…! चाहे घर हो, समाज हो, देश हो या दुनियां…. सत के मार्ग में बाधक होना यानी सर्वोपरि का कोपभाजन होना है! ‘उसे’ बस प्रकृति को इशारा ही तो करना है… और बड़े से बड़ा सुदृढ़तम स्तंभ भी ढह जाना है..! सत का मार्ग …. सदाचार का मार्ग अपनायें… सन्मार्गी बनें, सन्मार्गियों के समर्धक बनें… सतपथ के अनुगामी बनें, स्थायी सुखी हो जायें…! कम से कम सतपथ के पथिकों का विरोध तो ना ही करें…! सतपथ के पथ पर चलने वालों पर ईश्वर का आशीष सदा से रहा है और रहेगा…! फिर चाहे वह सत्पथिक हाथी सा विशालकाय हो या चींटी सा सूक्ष्म!

@जय माता दी!#

-सुबुद्ध सत्यार्चन!
(आश्विन नवरात्र- प्रतिपदा!)

विचरण अनंत !

बैठे हम भोपाल में, करते कांव कांव!

जी चाहे उड़ जायेंगे… रच लेंगे एक और गांव…!


मन की आंखें, मन के पांव…
चल उठ…बैठे अगले ठाॅंव!


कवि/ कलमकार विषम अनंत
करे भाव विचरण दिग दिगन्त…!


-सुबुद्ध सत्यार्चन