विशेष रुप से प्रदर्शित

आइये समृद्ध हो लें!

“किसी भी युद्ध में, पृथक-पृथक मोर्चों पर कुशलतम योद्धाओं को भी एक-एक कर लड़ने भेजने पर केवल वीरगति ही दिलाई जा सकती है…. विजयश्री का वरण नहीं किया जा सकता! विजय पाने कुशल / अकुशल योद्धाओं की टुकड़ी को, योजनाबद्ध तरीके से साथ मिलकर एक के बाद एक मोर्चे पर संगठित आक्रमण करना होता है”
विचार करें ….  आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है… तय हमें करना है कि हम अलग-अलग प्रयासों को मरते देखना चाहते हैं…,  जिसमें किसी को किसी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होनी है …., या एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ चलकर,  हिन्दी को और हिन्दुस्तानी भाषाओं को सशक्त करने में योगदान करना है!….

आइये भारत को समृद्ध करें!!!

(नव-आकर्षक  योजनाओं  व अद्यतनों के साथ पुनर्निवेदित…)

  • आपकी तरह या हर सामान्य भारतीय की तरह ही “मैं भारत हूँ!”
  • मैं; सत्यार्चन- अन्याय, अनीति, अनाचार, अत्याचार, असत व अनर्गल के विरुद्ध आजीवन आंदोलनरत एक भारतवासी हूँ!
  • राष्ट्रवादी सुझाव युक्त हिंदी-लेखन के लिये, 2010 में, अंतर्राष्ट्रीय संस्था  “सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल ” द्वारा “राष्ट्रीय रतन अवार्ड” हेतु नामाँकित हुआ.
    • मैं, फेसबुक, ट्विटर से जागरण जंक्शन तक सोशल मीडिया सक्रिय, राष्ट्रवादी,  पाठक, विचारक, योजनाकार, जागरूकता का प्रचारक कार्यकर्ता, यथार्थवादी लेखक तथा “इंडियन जर्नलिस्ट फार इंडियन पीपुल” की म.प्र. इकाई का अध्यक्ष हूँ.
    • मेरी ही तरह,  भारत, हर भारतवासी का है , हर किसी के चिंतन में भारत का होना स्वाभाविक है.
    • इसीलिए आप कलम के जादूगर हों, माहिर खिलाड़ी हों या सिखाड़ी ही हों  …. आपके सीने की आग को बाहर निकालने हेतु यहाँ “लेखन हिन्दुस्तानी” पर सबका स्वागत है !
    •  हालाँकि; सभी अपने अपने तरीके से अपने ब्लॉग आदि पर देश के प्रति अपनी चिंता / अपने कर्त्तव्य का प्रदर्शन करते रहते हैं जिससे कई बार एक ही तरह के विचार लगभग एक जैसे शब्दों में कई अलग ब्लॉगों पर मिल जाते हैं. इसीलिये विचारणीय है कि  “किसी भी युद्ध में, पृथक-पृथक मोर्चों पर कुशलतम योद्धाओं को भी  एक-एक कर लड़ने भेजने पर  केवल वीरगति ही दिलाई जा सकती है…. विजयश्री का वरण नहीं किया जा सकता!  विजय पाने कुशल / अकुशल योद्धाओं की टुकड़ी को, योजनाबद्ध तरीके से साथ मिलकर एक के बाद एक मोर्चे पर संगठित आक्रमण करना होता है”

    http://wp.me/p4TEDf-p
    स्थापित और गुमनाम, दोनों, कलमकारों को आह्वान ….
    (चित्र – गूगल से साभार…)
  • विचार करें ….  आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है… तय हमें करना है कि हम अलग-अलग प्रयासों को मरता देखना चाहते हैं…,  जिसमें किसी को किसी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होनी है …., या एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ चलकर,  हिन्दी को और हिन्दुस्तानी भाषाओं को सशक्त करने में योगदान करना है!
  • साहित्य समृद्ध हुआ तो राष्ट्र समृद्ध होगा ! यदि कर्तव्य निर्वहन का श्रीगणेश करना है तो …. अनुरोध है कि,  देश हित में https://lekhanhindustani.com/ को  भी ‘आपका अपना’ ‘लेखन-मंच’  मानें और संकल्प ले सहयोग करें  …… ���पनी कलम के जादू या अनाड़ीपन पर विचार किये बिना,  आपकी अपनी शैली में,  भाषायी सेवा के लिए, आपकी सर्वोत्तम (नई या पुरानी) ब्लॉग-पोस्ट को इस निवेदन के टिप्पणी / प्रतिक्रिया खण्ड में चिपकायें, ( या उसका संक्षिप्त विवरण सहित शीर्ष लिंक यहां चिपकायें !)  या सीधे यहाँ ही प्रतिक्रिया के रूप में लिखें !
  •  सभी उद्गार आपके ब्लॉग पते के उल्लेख सहित प्रकाशित होंगे !
  • 1 सितम्बर 2017 से “लेखन हिन्दुस्तानी” (वर्डप्रेस बिज़नेस ब्लॉग में बदलकर) समूह ब्लॉग होने जा रहा है… तब सभी उपयुक्त प्रेषक रचनाकारों को लेखन हिन्दुस्तानी के लेखक वर्ग में भी सम्मिलित कर लिया जायेगा!
  • प्रेषित में से सर्वश्रेष्ठ रचनाकार को मासिक, त्रैमासिक व वार्षिक सम्मान-निधि एवं सम्मान-पत्र से सम्मानित किया जायेगा!  (विस्तृत विवरण केवल प्रेषक के मेल पर भेजा जायेगा!)  इससे हमारे माध्यम से आपको बिना कुछ भी खोये , निःशुल्क प्रकाशन व प्रोमोशन सहित प्रतिष्ठा लाभ भी  प्राप्त होगा !!!
  • आपके सुझाव, शिकायत, पोस्ट व प्रतिक्रिया लिखने;  टिप्पणी,  रिएक्शन या प्रतिक्रिया  विकल्प का प्रयोग कीजिये !
  • योगदान अपेक्षित एवं वांछनीय है !
  •  शुरुआत कीजिये आज ही ! अभी! प्रतीक्षा रहेगी….
विशेष रुप से प्रदर्शित

ज़िद है जिद

   जिद है जिद…..

Image

दोस्तो:

हम हिन्दी हमारी संस्कृति के प्रति इतने कृतघ्न हो चुके हैं

कि हम हमारे  संस्कारों के उपहास में

स्वयं भी ना केवल सम्मिलित ही हैं

वरन अपने ही उपहास पर

अट्टहास किए जा रहे हैं!!!!!!

.

वे जो षणयंत्रकारियों के चंगुल में

असहायता-वश जा फँसे हैं या अविवेक-वश

उन्हें भी हाथ बढ़ाकर वापस खींचने का दायित्व

आप-हम संस्कारी भारतीयों का ही है!

पहला कदम बढ़ाने से पहले

आवश्यक है कि ‘हम-सब’

जागृत-जन एक साथ

हाथों में हाथ लेकर

कदम से कदम मिलाकर

साथ-साथ बढ़ें!!!

.

इसीलिए आव्हाहन और अनुरोध है

हर उस  सच्चे ‘हिन्दी-जन’ से

जिसे अपने हिन्दी होने पर गौरव हो!

जो अपने समस्त व्यतिगत, जातिगत, सामाजिक, राजनैतिक, क्षेत्रगत, अनुरागों से

राग-द्वेषों से  निष्पृह रह

हिन्दी के प्रति अपने दायित्व की प्रतिपूर्ति में

जो बन पड़े कर सके!

यथा-

जो लेखन में हैं

अपनी दृष्टि में अपनी सर्वोत्तम रचना भेजें,

या आपको किसी अन्य की कोई रचना प्रशंसनीय और पठनीय लगी हो

उसके ‘कापी राइट उल्लंघन’ से सुरक्षित रहते हुए

उसके संपादक / प्रकाशक आदि के उल्लेख के साथ हमें भेजें!

हिंदी लेखन से जुड़े अनेक ऐसे विशिष्ठ विचारक भी हैं

जिन्हें उचित अवसर, मंच या प्रायोजक मिलने शेष हैं

वे अपनी कृतियाँ हमें टिप्पणी या ई-मेल कर भेजें!

समस्त स्थापित / अस्थापित ब्लाँग लेखन से संबद्ध जन

 अपनी श्रेष्ठतम कृति के साथ (केवल लिंक अस्वीकार्य कृति आवश्यक रूप से संलग्न हो) अपने

ब्लाँग का लिंक भेजें और हमारी ‘अनूठी प्रायोजन योजना’ का लाभ उठायें!

जि़द़ है…. हिंदी, हिंद, हिंदु हित की अब ज़िद़ है….

चुनाव2019 के भीष्म

सम्पूर्ण राजनीति और सभी राजनीतिज्ञों को निकृष्ट मानने, समझने, जताने का अर्थ श्रीराम, श्रीकृष्ण को निकृष्ट मानना नहीं है क्या? क्या आप दुर्योधनों के कारण युधिष्ठरों के अपमान के दोषी नहीं बन रहे?

किसी की राजनीति बिषय पर गहन आपत्ति है कुछ को “लेखन हिन्दुस्तानी” साहित्यिक की जगह राजनैतिक लग रहा है… उनकी आपत्ति पूरी तरह सही हो सकती है…. किन्तु कुछ किंतु-परंतु के साथ….
– हर लेखक समाज का अग्रणी जागरूक नागरिक है… और उसका भीष्म पितामह की भूमिका में रहना निंदनीय है…. दोनों स्थितियों में… तब भी जब चीरहरण हो रहा था और भीष्म पितामह मौन थे… और तब भी जब धर्मयुद्ध में वे अधर्म की ओर से लड़ रहे थे…
आज भारत की 80% जनता चीरहरण कराती द्रोपदी सी निरीह स्थिति में है… कौरव, पाण्डव और उनके जैसे अन्य छोटे बड़े राजघराने मिलकर चीरहरण को प्रयासरत हैं…. अनेक दुर्योधन अनेक अर्जुन अनेक शकुनि और बहुसंख्य कर्ण… हम भीष्मों का मुंह ताक रहे हैं…और हम राजनीति से निष्पृह रहने की भीष्मप्रतिज्ञा लिए बैठे हैं… या फिर दिल्ली या हैदराबाद की राजगद्दी में से किसी को चुनकर उनके काले-पीले हरे-नीले सबमें उनके साथ खड़े हैं….! दोनों अनुचित हैं!!!!

जागरूक हैं तो जगाने के दायित्व से बिमुख नहीं हो सकते!

सम्पूर्ण राजनीति और सभी राजनीतिज्ञों को निकृष्ट मानने, समझने, जताने का अर्थ श्रीराम, श्रीकृष्ण को निकृष्ट मानना नहीं है क्या? क्या आप दुर्योधनों के कारण युधिष्ठरों के अपमान के दोषी नहीं बन रहे?

  • विशुद्ध प्रचार के वीडियो, लेख या लिंक साझा नहीं किये जाने चाहिए किन्तु चुनाव के मौसम में सबके उत्साहपूर्ण अनैतिक आचरण अनदेखे करना ही उचित है इसीलिए…. चुनाव के बाद सख्ती से केवल साहित्यिक (राजनैतिक साहित्य भी) गतिविधियों ही स्वीकार्य रहेंगी…!
    चंद दिनों की असुविधा के कारण ब्लाॅग/ समूह मत छोड़िये मित्र…. कल सुनहरा ही होगा…. अच्छे पल अवश्य आयेंगे!
  • सत्यार्चन

ज्ञानोद्भव

यह नजरिया ही है जो मानने से रोकता है किन्तु जिज्ञासु के मन में जानने की प्यास/ जिज्ञासा भी यही जगाता है और प्यास सदाशयी बनाती है… आगत के स्वागत को तत्पर…
ज्ञान के पादप का पल्लवन तभी संभव है जब ज्ञान के बीज को ज्ञान की भूमि में रोपकर, ज्ञान के जल से सिंचित हो , ज्ञान के उर्वरक से पुष्ट, ज्ञान के प्रकाश से आलोकित, और ज्ञान के कीटनाशक से दोषरहित रख उसे ज्ञानपूर्ण पोषण मिल सके!

-सत्यार्चन

मैं अकेला ही काफी हूँ!! — “Kumar Ranjeet”

इश्क़ में जीत के आने के लिये काफी हूँ मैं अकेला ही ज़माने के लिये काफी हूँ हर हकीकत को मेरी ख्वाब समझने वाले मैं तेरी नींद उड़ाने के लिये काफी हूँ ये अलग बात के अब सुख चुका हूँ फिर भी धूप की प्यास बुझाने के लिये काफी हूँ बस किसी तरह मेरी नींद […]

via मैं अकेला ही काफी हूँ!! — “Kumar Ranjeet”

श्रेष्ठ आराधक

💐🙏🏽💐 सद्गुरु कहते हैं कि श्रीराम का श्रेष्ठ आराधक वह है जो अपने जीवन में राम के आदर्शों को जीने का सर्वोत्तम प्रयास करे …!

श्रीराम सर्वहारा के आराध्य हैं! क्यों?

इसलिए कि वे सर्वदा आदर्श हैं और आदर्श का अनुसरण ही उसकी वास्तविक पूजा-अर्चना, आराधना है… अन्यथा आपके मुंह पर आपके कृतित्व को, स्वार्थसिद्धि तक महान बताने, फिर मखौल उड़ाने वाले के प्रति, जैसी आपकी मानसिकता होगी, वैसी ही ढोंगियों के प्रति उस सर्वोपरि की क्यों ना हो?

इसीलिए, पूजा, प्रार्थना, अनुग्रह, अनुसरण या अनुकरण पूरे मन से, आत्मिक आनंद के लिए हो… मात्र प्रदर्शन के लिए नहीं!

-सत्यार्चन सत्यव्रत सुबुद्ध

कुर्बानी- नेकी के लिए!

अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…!

सभी मजहबों/ धर्मों की किताबों में लिखे वाकये वो नजी़रें हैं जिनको अमल में लाया जाना ही मुनासिब है…

इस्लामिक आस्था से जुड़ी, “कुर्बानी” भी ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है!

इस्लाम में कुर्बानी की शुरुआत का जिक्र, सर्वोपरि “हुजूर” का अपने फालोअर्स में सबसे अधिक वफादारी का दम भरने वालों की मौजूदगी में, उचित को चुनकर उसे कपनी वफादारी साबित करने के इम्तेहान से गुजरने का मौका दिया! जिसके लिए उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने को कहा गया. तब पिता अपने बेटे की कुर्बानी देने को, और बेटे का कुर्बान होने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाने का वाकया लिखा है! हुजूर के दरबार में घटी इस घटना के दृश्य में पिता की आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की तलवार से कुर्बानी दी जाना और कुर्बानी के बाद पट्टी खुलने पर बेटे की जगह गर्दन कटे हुए बकरे का देखा जाना, बताया गया है!

इसमें एक से अधिक सीख समाहित हैं…

1- जब तुम्हारे बुजुर्ग, जो हुजूर की जानिब से तुम्हारे कुदरती खैरख्वाह हैं, के हुक्म की तामील करो… बिना किसी शक-ओ-शुबहा के बस अमल करो!

2- अगर तुम सच्चे हो, ईमान पर हो और तुम्हें तुम्हारी सच्चाई का इम्तेहान सबके बीच देने कहा जाये तो दिखा दो कि तुम सच्चे हो!

3- नेकी की राह कुर्बानी चाहती है… नेकी के लिए कोई भी कुर्बानी छोटी है…!

रमजान आने को हैं फिर “ईद-उल-जुहा” ! तो अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…! रक्त बहाने के लिए नहीं सहेजने के लिए हो आपकी कुर्बानी! किसी को ज़िन्दगी देने के लिए हो आपकी कुर्बानी…

जरूरी होने पर जब औरों से आंखें, लीवर, किडनी, ब्लड, बांह, मांस, होंठ आदि लिए जाने में मज़हब आड़े नहीं आता है तो इत्मीनान रखिये, इनके दिये जाने में मज़हब दीवखै कैसे हो सकता है! चाहें तो अपने मौलाना से मशविरा करें और जायज़ पायें तो आगे बढ़ जायें… दीन के काम आकर मुस्लिम समुदाय को इज्जत बख्शने की वजह बन जायें!

जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनायें! इंसानियत के नाम इंसान होने का सबूत दें! इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर इंसानियत के काम आयें! इस्लाम का रुतबा ऊंचा रखने अपनी कुर्बानी देकर दिखायें!

सबसे अच्छी वो कुर्बानी, जो दे किसी को जिंदगानी!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

क्रेडिट /डेबिट कार्ड!

क्रेडिट/डेबिट कार्ड आज हर किसी की सुविधा ही नहीं आवश्यकता बन गये हैं . इनके 3 प्रकार के उपयोग करता हैं! 1ली तरह के लोग ही इसका सही तरह प्रयोग करते हैं! 2री तरह के लोग इस उपयोगी सुविधा का डर के कारण पूरा लाभ उठा पाने से वंचित रह जाते हैं और

3रे प्रकार के लोग लापरवाही से उपयोग कर अपने नुकसान का कारण बन जाते हैं…

तीनों ही तरह के उपयोग कर्ता ऊपर साझा की गई तस्वीर से परिचित होंगे? अधिकांश कार्ड्स इसी प्रकार एक कागज पर चिपका कर भेजे जाते हैं! कभी सोचा कि इस तरह क्यों भेजे जाते हैं? आप कहेंगे ताकि कार्ड के गिरकर खोने का डर ना रहे… कुछ हद तक सही भी है किन्तु इसके लिए कई रंगों से छपे और हाइलाइटेड पेपर पर चिपकाने की क्या जरुरत थी?

असल में कार्ड- कम्पनियां हमारी आलसी और लापरवाह आदतों से परिचित हैं. हमारी लापरवाही का खामियाजा उनकी साख पर नकारात्मक प्रभाव को घटाने के उद्देश्य से कम्पनियां चाहती हैं कि कार्ड की सुविधा का अधिकतम व सुरक्षित लाभ उठाने आप कम से कम अतिआवश्यक जानकारी अवश्य लें. इसीलिए रंगीन हाइलाइटेड स्याही में अति महत्वपूर्ण सूचना व सावधानियां छापे हुए कागज पर कार्ड को चिपकाकर भेजा जाता है। ताकि कार्ड निकालते समय शायद आपकी दृष्टि पड़े और शायद आप पढ़ कर स्वयं को धोखाधड़ी से बचाना सीखकर कार्ड प्रदाता कंपनियों पर उपकार करें!

विनम्र राजा! -एक लोककथा

विनम्र राजा! -एक लोककथा

प्राचीनकाल में, सोहागपुर राज्य में एक अत्यंत चतुर, बुद्धिमान व यशश्वी राजा का शासन था. राजा का अपनी प्रजा के वास्तविक हालचाल जानने का तरीका अनोखा था. वो अपने दरबार की शुरुआत दरबारियों, मंत्रियों सहित नगर भ्रमण करने से किया करता. रोज चल-दरबार से लौटकर ही राजमहल में दरबार सजता था. राजा नगरभ्रमण पर हाथी, रथ, बग्घी, आदि अलग अलग तरह की सवारियों पर निकलता था आमजनता से भेंटकर उनके हालचाल स्वयं ही पूछता था. एक दिन राजा पैदल ही नगरभ्रमण पर निकला तो मंत्री, दरबारी सबको भी मजबूरन राजा के पीछे पीछे पैदल चलना पड़ा. अपने राजा को अपने समान पैदल चलते देख जो भी स्त्री-पुरुष सामने से आता आदर से अभिवादन, प्रणाम करता. राजा भी उनके अभिवादन का, सर झुकाकर प्रणाम से उत्तर देता जाता… तभी सामने से नगरसेठ और उसकी पत्नी आये, नगरसेठ ने राजा को कमर तक झुककर प्रणाम किया तो राजा नगरसेठ के पैरों में साष्टांग दंडवत मुद्रा लेट गये…. मजबूरन दरबारियों को भी ऐसा ही करना पड़ा. सभी दरबारी राजा के नगर सेठ को साष्टांग दंडवत से आक्रोशित थे, सबने आपस में सलाह कर राजा की इस हरकत के विरोध का निश्चय किया. लौटकर दरबार सजते ही एक वरिष्ठ सभासद ने प्रश्न उठाया “राजन आपका सेठ दम्पत्ति के सामने साष्टांग दंडवत होना किसी भी तरह उचित नहीं आपके इस तरह के आचरण से तो जल्द ही राजसत्ता का मान मिट्टी में मिल जायेगा… “

राजा ने उत्तर दिया “मित्र; मैं कुछ भी सहन कर सकता हूं किन्तु यह नहीं कोई मुझसे अधिक विनम्र हो… और वो व्यापारी दम्पत्ति मेरे अभिवादन में कमर तक झुके हुए थे…

समझिये-समझाइये!

-सत्यार्चन

परिष्कृत प्रारब्ध क्या है?

प्रारब्ध या नियति पर बहस व्यर्थ की बहस है…
आपकी पारिस्थितिकी
(आपका देश, काल और परिस्थिति) आपके नियति निर्धारक नहीं है किन्तु आपकी नियति का छद्म किन्तु दृढ़ घेरा अवश्य बनते हैं…

उत्कृष्टता आकांक्षितों को अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य से इस घेरे को तोड़ बाहर निकलना होता है…. तब अगले बड़े होते जाते घेरे आसानी से टूटते जाते हैं…. प्रारब्ध परिष्कृत हो पक्षकर बनता जाता है….

और व्यक्ति मनवांछित उत्कृष्टता को पा लेता है या निकट तक पहुंच जाता है…

अन्यथा अन्य पशुओं की तरह ही सामान्य व्यक्ति, सामान्यतः माता पिता के समान जन्म, पोषण, प्रणय, संतोनोत्पत्ति और मरण के पहले घेरे में ही सीमित रह खुशी-खुशी जीवन जीकर परलोक गमन कर जाता है!

पहले घेरे में सीमित रह पशुवत जीने वाले या संघर्ष कर अनेक घेरों को तोड़ उत्कृष्टता तक पहुंचने वालों में से कोई भी श्रेष्ठ या निम्न नहीं हो सकता….

प्रश्न पथचयन का है… मनचाहे पथ के पथिक हो निरंतर चलते रहें… अपनी जीवन यात्रा, अपनी इच्छानुसार संपन्न करें… ना पथभ्रमित हों ना पथभ्रष्ट…
हरि ओम्!

मेंहदी तो रंग लाती है…

मेंहदी तो रंग लाती है…

तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है…
.
सजनी के हाथों सज
साजन की
मुस्कान बन जाती है
बड़ी करामाती है
तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है!
.
मेंहदी की भी ख़्वाहिश
यही रही होगी
मिट जाऊं
पिस जाऊं
हर एक सजनी को मगर
ऐसे सजाऊं
ऐसे रच जाऊं
कि
उम्र गुजर जाये
उतारे से भी रंग
कभी उतर ना पाये!
साजन, सजनी की
और सजनी
साजन के
दिल की
धड़कन बन जाये!
तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है…!
.
जब मेंहदी हाथों में
और
दिल में साजन को
सजनी सजाती है
मेंहदी
गहरी…
बहुत गहरी
ऐसे रच जाती है…
उम्र गुजर जाती है
उतर नहीं पाती…
गहराती जाती है.
बड़ी करामाती है
तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है!
-सत्यार्चन