आइये अपने देश की खातिर कुछ लिखें !!!

आइये अपने देश की खातिर कुछ लिखें !!!

  • मैं- एक भारतवासी, हिंदी में लेखन के कारण एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था  “सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल ” द्वारा “राष्ट्रीय रतन अवार्ड” हेतु 2010 में नामांकित हुआ. मैं,  ट्विटर से जागरण जंक्शन तक सोशल मीडिया का नियमित उपयोगकर्ता / राष्ट्रवादी / लेखक / पाठक हूँ.
  • मेरी ही तरह,  भारत, हर भारतवासी का है , हर किसी के चिंतन में भारत का होना स्वाभाविक है.
  • आप कलम के जादूगरों में से हों या  कलम के अनाडी हों …. आग सबके सीने में है . सब अपने अपने तरीके से अपने ब्लॉग पर देश के प्रति अपनी चिंता / अपने कर्त्तव्य का प्रदर्शन भी कर रहे हैं . करते रहे हैं. कई बार एक ही तरह के विचार अलग-अलग शब्दों में अलग-अलग ब्लॉगों पर मिल जाते हैं.
  • एक तथ्य है कि  “किसी भी युद्ध में, पृथक-पृथक मोर्चों पर कुशलतम योद्धाओं को  एक-एक कर लड़ने भेजकर  केवल वीरगति ही दिलाई जा सकती है…. विजयश्री का वरण नहीं किया जा सकता!  विजय पाने कुशल / अकुशल योद्धाओं की टुकड़ी को, एक साथ एक-एक मोर्चे पर संगठित आक्रमण कर ही जीता जा सकता है”
  • विचार करें ….  आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है…
  •  तय करना है कि अलग-अलग प्रयासों को मरते देखना है… जिसमें किसीको कोई प्राप्ति नहीं होनी है ….  
  • या एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ चलकर,  हिन्दी को और हिन्दुस्तानी भाषाओं को सशक्त करने में योगदान करना है!
  • साहित्य समृध्द हुआ तो राष्ट्र समृध्द होगा ! यदि कर्तव्य निर्वहन का श्रीगणेश करना है तो …. अनुरोध है कि,  देश हित में https://lekhanhindustani.com/ को  भी ‘आपका अपना’ ‘लेखन-मंच’  मानें और संकल्प ले सहयोग करें  …… अपनी कलम के जादू या अनाडीपन पर विचार किये बिना,  आपकी अपनी शैली में,  भाषायी सेवा के लिए, आपकी हर पुरानी व नई ब्लाग-पोस्ट को इस पोस्ट के टिप्पणी / प्रतिक्रिया खण्ड में चिपकायें,  या उसका संक्षिप्त विवरण सहित शीर्ष लिंक यहां चिपकायें ! या सीधे यहाँ ही प्रतिक्रिया के रूप में लिखिए ! सभी उद्गारों को आपके ब्लाग पते के उल्लेख सहित प्रकाशित होंगे ! हमारे माध्यम से आपको बिना कुछ भी खोये , निःशुल्क प्रमोशन का लाभ,  प्राप्त होगा !!! 
  • प्रतिक्रिया लिखने रिप्लाई या प्रतिक्रिया  विकल्प का प्रयोग कीजिये ! योगदान वांछनीय व अपेक्षित है !
  • निर्धारित अंकों एवं पाठकों की पसंद आधारित मासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, एवं वार्षिक अवार्ड की योजना भी है….
  • साथ ही चयनित एवं उपयुक्त कलमकारों को हमारी पत्रिका में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाकर, अनौखी सहभागिता योजनांतर्गत पारिश्रमिक/रायल्टी का भी अवसर है.
  •  शुरुआत कीजिये आज ही ! अभी! प्रतीक्षा रहेगी….

Fearful GOD!

Fearful GOD !

People don’t beleave in being God near them !
Beacuse they think themselves eligble for being blessed with HIS/Her Blessings!
However if they believe Being GOD’s Presence in their surroundings, They expect they have to do nothing,
if HE / SHE is closure to them ,
HE/ SHE has to show
HIS/HER miracles….
by availing each n every thing whatever might have wished by any of them …..
Thats why….  GOD are fearfull….
being amongst common-men!
The common-men might gonna KIL The GOD….
…. for not fulfilling their endless wishes!
… n
…. I think GOD must have remain FEARFULL of crowed!!!
#SathyArchan
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सर दर्द!

सर दर्द!

मेरा सर दर्द से फटा जा रहा था—

मैंने रुमाल उठाकर अपने सर पर बाँध लिया! थोड़ी देर को आराम मिला मगर दर्द फिर से सताने लगा ! मैंने एक रस्सी उठाई और रुमाल के ऊपर से ही बाँध ली!

वो देख रहे थे दूर से ,

बड़े ध्यान से!

कौन ?

मेरे अपने—

यानी मेरे सबसे बड़े हितैषी!

पत्नी ने चिल्लाते हुए टोका “ये क्या कर रहे हो…?”

मैंने कहा “सर दुख रहा है, तो बाँध लिया ….”

इसी बीच कहा सुनी सुनकर मेरे छोटे बड़े भाई भी आ गये थे और चुपचाप तमशबीन बने खड़े रहे.

पत्नि- “मगर ये रस्सी क्यों बाँधी है ? बहुत खराब लग रहा है देखने में इसे खोल दो”

मैं – “यार रुमाल बाँधने से थोड़ा आराम मिला था तो जोर से रस्सी से बाँध लिया अब ज्यादा आराम है…”

“वो तो ठीक है मगर ये कौनसा तरीका हुआ आराम पाने का …. भाभी सही कह रही है … रस्सी हटा दो… बहुत खराब लग रही है” बडे़ भया बोले.

मुझे मानना पड़ा…. मंने रस्सी हटा दी.

थोड़ी ही देर में दर्द फिर बढ़ने लगा तो मैं अपने हाथ से सर में धीरे धीरे मुक्के मारकर मसाज करने लगा … फिर थोड़ा आराम मिला… पत्नि ने फिर देखा फिर से टोका ….

“अब ये क्या कर रहे हो ? … भैया जी को बोलती हूँ…. उनकी बाइक पर बैठकर डाक्टर के पास जाकर दवाई ले आओ…. पागलपन मत करो !”

उसने भैया को आवाज लगाई.

वो आ गये और मुझे जाना पड़ा ….

अस्पताल पहुँचते-पहुँचते दर्द खत्म सा था…. फिर भी एहतियातन डाक्टर को दिखाया… ई सी जी, ई ई जी, एम आर आई वगैरह कुछ टेस्ट कराये गये …. और आगे कभी दर्द होने पर तुरंत अस्पताल आने की हिदायत लेकर हम घर को वापस आ गये .

हमने इस सबमें, एहतियातन 17000/- रुपये खर्च कर दिये थे !

3-4 साल हो गये इस बात को… दोबारा सर दर्द हुआ ही नहीं ….

हे भगवान …. हो भी नहीं !

वो पिछला वाला डाक्टर तीनेक साल पहले ही सर दर्द से मर चुका है….

अगर अब सर दर्द हुआ तो ….

नया अस्पताल, नयी जाँचें, नया तरीका, नया खर्च ….

शायद एकाध महीने भर्ती ही रहना पड़ जाये….

…. एहतियातन …. घरद्वार ही बेचना पड़ जाये !

बदतर को तत्पर रहें फिर जीभर जियें !

बदतर को तत्पर रहें फिर जीभर जियें !

बड़ी-बड़ी एड्स, केन्सर, हार्ट प्राब्लम

जैसी बीमारियों के साथ भी

बड़ा सामान्य जिया जा सकता है,

सर्जरी के बाद भी —-

यदि हम बदतर को तत्पर रहें

फिर जीभर  जियें

बस कोई भी बीमारी
मन को बीमार ना कर पाये  —
इतना ही ध्यान रखना होता है,
बीमार को और उसके साथियों को!

बस बदतर को तत्पर रहें

फिर जीभर जियें !

आप को पता है कि स्वस्थ दिखते 10

लोगों में से 4 का दिल असामान्य होता है

जब तक उन्हें पता नहीं होता मस्त जी रहे होते हैं,
पता लगते ही तकलीफ़ 4 गुना बढ़ा लेते हैं!

लेकिन कुछ लोग तनाव नहीं लेते

और पहले की तरह मस्त बने रहते हैं!
उनका हार्ट भी पहले की ही तरह,

जितना कर पा रहा है,

निश्चिंत रह, काम करते रहता है —-

बंद होने तक !
मैं भी इसी तरह का इनसान ही हूँ!
जानता हूँ,

किसी दिन सोते -सोते चला जाऊंगा —-

मगर रोज चैन से सोता हूँ!

फिर भी, रोज,

सुबह हो जाती है,
तो उसका धन्यवाद करता हूँ —-

एक और दिन देने के लिये —

और पिछले दिये दिनों के अवसरों के लिये भी —-
उसकी मर्जी तक ही साँसें चलती हैं!
ना एक भी कम,
ना एक ज्यादा!
ना आप जान ही सकते हो कि कितनी,

लाख चाहकर भी

आप एक भी साँस नहीं बढ़ा सकते

ना कोई एक भी घटा सकता है!

ना आपके हाथ में कुछ है

ना जानकारी में!
फिर तो हर दिन,
हर पल उसके बुलावे को

तत्पर रहने से अधिक ताकत

और किसी तरह नहीं ही मिल सकती!
इसीलिए तत्पर रहता हूँ!
इस विश्वास के साथ कि

125 -150 साल तो उसने,

उसके रास्ते पर चलने,

जरूर दिये होंगे!

वो इतना तो चाहेगा ही—
कम चाहेगा तो भी,

मेरे हित के ही लिये!
वो कोई अहित नहीं करता —-

हम ही होते हुए हित में,

अहित ढूंढ़ परेशान होते रहते हैं!

या होते हित को तुरंत नहीं समझ पाते —-
और कभी-कभी ,

कभी भी नहीं समझ पाते!

जिसे आप सबसे खराब समझते हैं

उसके होने को स्वीकारने

जब आप तत्पर हो जाते हैं

तो  कम से कम

उसके घटित हुए बिना ही,

बार-बार उसके घटने की पीड़ा से,

उसके वास्तव में घटने तक तो

बचे रह ही सकते हैं!

बस मेरे स्वयं के,
सदा आनंदमय रहने के यही सूत्र हैं!

#सत्यार्चन

ईमान खतरे में है —

जहाँ में है रोशन
सियासत नफरतों की,
सुलतान का अब
ईमान खतरे में है!

अमन की फ़िजा में
साँसों का ख्वाहिश मंद,
दुनियाँ का एक-एक
इंसान खतरे में है!!

नया विचार नई परम्परा!

दोस्तो,
क्या आपको पता है कि

“शादी विवाह, गृहप्रवेश, जन्मोत्सव आदि के समय उपहार लेकर जाने की परम्परा के पीछे कौनसा उद्देश्य छुपा है ?”

“उद्देश्य है कि

” हर एक व्यक्ति ऐसे अवसर अपनी सामर्थ्य की सीमा तक जाकर अपनी सारी पूंजी खर्च चुका होता है, ऐसे में उस अपने की,  उसका आत्मसम्मान आहत किये बिना, उल्लासपूर्वक मदद
करना!
“किन्तु आज के समय में तो, हर छोटी बड़ी बीमारी के इलाज में भी, इन छोटे बड़े हर्षोत्सवों जैसा ही, खर्च करना पड़ता है!”
ऐसे में क्या एक नई परम्परा के प्रचलन का विचार नहीं किया जाना चाहिये!

“शादी विवाह में अगर
हम किसी को आर्थिक मदद के लिए लिफाफा देते हैं तो बीमार को देखने जाते समय क्यों नहीँ दे सकते! जबकि बीमारी में मदद की आवश्यकता अधिक होती है!

कृपया चिन्तन अवश्य करें,….

शादी में तो गैर जरूरी दिखावे के खर्च बचाये जा सकते है पर बीमारी में जरूरी दवाइयाँ और इलाज तो जरूरी है !

ऐसे लिफ़ाफ़े लेकर जाने की शुरुआत इस तरह के शब्दों के साथ की जा सकती है-
“यह हमारे कुल की परम्परा है, कृपया स्वीकार कीजिये”

“नया विचार नई ऊर्जा”

प्रसारक

#सत्यार्चन

(सद्भाव के समर्थकों से पुनर्प्रसार की प्रार्थना है, अपेक्षित भी !)

बनायें, निभायें या तोड़ें परम्परायें !

  • बनायें, निभायें या तोड़ें  परम्परायें !
  • 28 मई 2017
    10:43
  •  • कोई भी परंपरा दुनियाँ बनने के साथ-साथ तो नहीं ही बनी होगी!
  •  • उन्मुक्त, उच्छृंखल और अनवरत स्वच्छंद विचरते से थककर कभी किसी ने कोई कार्य, कोई ऐसा संजीदा आचरण किया होगा, जिसे दूसरों ने अपनाकर खुशी पाई होगी!
  •  • ऐसे ही किसी का कोई आचार-विचार या व्यवहार सर्व जन हिताय लगा होगा, तभी सार्वजनिक अनुकरणीय होकर, परंपरा के रूप में ढला होगा!
  •  • “जो परम्परा आदि काल में अनुकरणीय थी क्या वह आज भी उपयुक्त है?”
  •  • “आज जिस परम्परा के सृजक / वाहक हम बने हैं,  क्या कल भी वही उपयुक्त रहेगी?”
  •  • “बिना किसी परम्परा के, समाज; जंगल बन जायेंगे! किन्तु आदिकाल की परम्पराओं को निभाते रहकर भी तो, जंगली ही प्रमाणित हो रहे हैं हम!”
  •  • इसीलिए; अपनी वर्तमान पारिस्थितिकी के
    अनुरूप,
    अपने लिये ,
    अपनी राह,
    अपनी परम्परा,
    सृजित कर,
    अपनी धरती पर,
    अपना स्वर्ग
    आप
    स्वयं ही बनाइये!!!

    #’सत्यार्चन’
    #SatyArchan
    #SathyArchan
    (#-A Global Name @ Web
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