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भारत लेखन हिन्दुस्तानी हिन्दी

आइये भारत को समृद्ध करें !!!

“किसी भी युद्ध में, पृथक-पृथक मोर्चों पर कुशलतम योद्धाओं को भी एक-एक कर लड़ने भेजने पर केवल वीरगति ही दिलाई जा सकती है…. विजयश्री का वरण नहीं किया जा सकता! विजय पाने कुशल / अकुशल योद्धाओं की टुकड़ी को, योजनाबद्ध तरीके से साथ मिलकर एक के बाद एक मोर्चे पर संगठित आक्रमण करना होता है”
विचार करें ….  आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है… तय हमें करना है कि हम अलग-अलग प्रयासों को मरते देखना चाहते हैं…,  जिसमें किसी को किसी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होनी है …., या एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ चलकर,  हिन्दी को और हिन्दुस्तानी भाषाओं को सशक्त करने में योगदान करना है!….

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हिंदी रत्न Uncategorized

ज़िद है जिद

   जिद है जिद….. दोस्तो: हम हिन्दी हमारी संस्कृति के प्रति इतने कृतघ्न हो चुके हैं कि हम हमारे  संस्कारों के उपहास में स्वयं भी ना केवल सम्मिलित ही हैं वरन अपने ही उपहास पर अट्टहास किए जा रहे हैं!!!!!! . वे जो षणयंत्रकारियों के चंगुल में असहायता-वश जा फँसे हैं या अविवेक-वश उन्हें भी […]

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निष्फल-सत्संग!

निष्फल-सत्संग!  अपनी प्रेक्षण क्षमता व उपलब्ध साधनों की सहायता से एक बार अपने आसपास, परिचितों, समाज,  देश में,  स्वयं ही देखकर निम्न का आंकलन कीजिए- 1- प्रतिष्ठित भजन /कैरल्स / सूफी के गायक। 2- प्रतिष्ठित ‘भक्ति-काव्य’ गायन मंडली के प्रमुख। 3- प्रतिष्ठित प्रवचन-कर्त्ता! 4- प्रतिष्ठित पुजारी / पादरी /मौलाना! 5- प्रतिष्ठित उपदेशक••• आदि! ध्यान दीजिएगा […]

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भैय्यूजी महाराज की हत्या? 

भैय्यूजी महाराज की हत्या?  #श्रद्धांजलिभैय्यूजीमहाराज! Follow my writings on https://www.yourquote.in/sathyarchan #yourquote

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वास्तविक धर्म 

वास्तविक धर्म   देवी-देवताओं के नाम चमत्कार युक्त मेसेज भेजकर फारवर्ड का अनुरोध या भय दिखाने में केवल समय व ऊर्जा ही नष्ट होती है!  रचने, निर्माण करने, सँवारने में या इनमें  सहयोगी होने में  ही धर्म है  और  नष्ट  करना केवल अधर्म! धर्म पथ के पथिक बनिये! बीमार का हाल पूछ लें तो अच्छा! भूखे […]

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कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें! 

*कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें!* जिसकी गोद में खेलकर बड़े हुए, जिससे सब कुछ अधिकार पूर्वक लेते रहे, उसकी तरफ भी, कुछ तो जवाबदेही बनती है ना हमारी…! *प्रकृति / कुदरत से, बस कर्ज लिये जा रहे हैं… इस कर्ज को   उतारने की क्यों नहीं सोचते?* क्या नहीं लेते हैं हम प्रकृति से…? और जो भी लेते हैं […]

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सामाजिक शिक्षण  

सार्वजनिक ‘ज्ञान वितरण पथ’ के पथिकों  को अपना मंतव्य प्राध्यापक (प्रोफेसर) भाव से रखना चाहिए! शिक्षक नहीं बनना चाहिये!  शिक्षक  का दायित्व किसी भी प्रकार सिखाने का होता है क्योंकि वह बच्चों को सिखा रहा होता है!  जबकि प्रोफेसर का दायित्व उद्बोधन देने तक का ही होता है••• (जिसे उचित लगे ध्यान से सुने- गुने […]

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तुम फिर••• 

तुम फिर••• फिर आ गये हो तुम   जगाने आस  गहराने प्यास हरि बार की तरह  करने निराश!  तुम ना आते  तो भी जी जाते  दर्द पीते आये हैं  पी जाते! मगर शायद तुम्हें नहीं  इसने पर संतोष   अनंत है तुम्हारा आक्रोश  तुम चाहते तो हो मुझे  सूली पर चढ़ाना मगर सहलाते भी हो  बार बार  […]

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जीवन दर्शन 

जीवन दर्शन  अपने जीवन में पीछे की ओर जाइये••• घटित को ईमानदारी से देखिये!  अपने सद्कर्म और असद्कर्म!  प्राप्तियाँ और लुप्तियाँ! सहयोग और असहयोग!  आशीष और श्राप!  सराहना और कोसना!  सभी कुछ••• जैसा जैसा बीज हम बोते जाते हैं कुछ ही समय बाद वैसी- वैसेी फसल आनी शुरु हो जाती है  सत और असत में […]

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चिन्तन, चिन्ता और दुःस्वप्न! 

हममें से ऐसा कोई भी नहीं है जिसका चिन्तन, चिन्ता और दुःस्वप्न से सामना ना हुआ हो! किन्तु दुःखद यह है कि इन तीनों में उचित भेद करने में अधिकांश अक्षम हैं!

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फ़तह

कौन कहता है•••  है फ़तह बहुत मुश्किल?  कर मशक्कत माकूल  और    करता रह मुसलसल••• हो जायेगी नामुमकिन  दिखती भी हासिल हो खड़ी दूर कितनी भी,  फिक्र नहीं करना •••  बस रखना मुकद्दस,  तू सदा अपनी मंजिल!  -सत्यार्चन   

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गुनाह!

गुनाह!  मानवता को पीट-पीट कर  मारा जा रहा था••• वो मानव था करने लगा बीच बचाव, उसका क्या गुनाह  उसे क्यों मिलती नहीं पनाह  चीखता नहीं है वो पर रुकती नहीं कराह••• उसके अंदर जीवित हैं  संवेदनायें  बस यही उसका गुनाह! 

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