अकृत की गवाह

अकृत की गवाह

जानते हो 
जिंदगी क्यों दर्द है?
क्योंकि जो हासिल है
वो ऊब हुआ
जो बाकी है
वो है प्यास!

कभी कहीं किसी जगह
हासिल से हटकर
प्यास सा
प्यास से मिलता-जुलता
मिल जाता है
तो
प्यासा तोड़ने की
नैतिकता व्रत, उपवास, आस, विश्वास
कर बैठता है भूल
और
भूल को भुलाने की कोशिश में
भूल पर भूल
करता चला जाता है!
भूला सोचता है
भूलते तो
किसीने देखा ही नहीं
तो
कोई क्या जाने ?
जो
मैं बताऊं
वही तो सब मानें! 
एक भूल भी भूल है
दस बीस भूल भी भूल
मेरी एक भूल भी मुझ तक है
और भूल भी मुझ तक ही!
पर भूला भूल ही जाता है
मौजूदगी एक गवाह की
जो होती है हमेशा
हर जगह
उसके अपने भीतर बैठी
उसकी अपनी ही आत्मा! 
और आत्मा
अनैतिक को
कहाँ स्वीकारती है?
मौके बेमौके
कचोटती है•••
दुत्कारती है!
तेरी आत्मा का
आत्मिक संबंध है
और आत्माओं से भी
वे भी जल उठती हैं
तेरी आत्मा की धधकती
गुनाहों की आँच से
तपती हुई आत्मायें
तब होती हैं सब
आसपास!
फिर
ना भूला भूल पाता है
ना
भुलाना चाहकर भी
भूल पाता है
उसका परिवेश! 
इसीलिए
सर्वोत्तम है स्वीकार !
अकृत कर्म का परिहार
प्रायश्चित
और
अपुनरावृत्ति के प्रयास का प्रण!
तुझपर है अब
तू करे सच का सामना
या
आजीवन बुनते रह
अकृत की
अनहोनी का
अनदेखी का
अनसुनी का
तानावाना !
-सुबुद्ध सत्यार्चन
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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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