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अपने, अपनापन और रिश्ते

💤💤 अपने, अपनापन और रिश्ते 💤💤

       एक बार किसी से अपनापन जाग गया••• कोई अपनों में शामिल हो गया तो•••

*वो तो अपन ही हो गया!*

*कोई अपने आप सा होकर आपमें समाहित लगने लगे तभी सच्चे अर्थों में वह आपका अपना है!*

    फिर अपने आप से रूठकर कोई दूर कैसे हो सकता है?

अपने आप पर कोई भी झुंझला तो सकता है मगर नाराज नहीं हो सकता•••

किसी अपने का आप से जुदा होना यानी किसी अंग को काटकर अलग करना•••

कभी कभी कुछ अंग अवज्ञा की जिद ठान लेते हैं••• कुछ अनुपयोगवश  निष्क्रिय हो जाते हैं••• बोझ बन जाते हैं••• विष बनकर फैलने लगते हैं••• तब उन्हें काटकर अलग करना होता है!
कृत्रिम या दान से प्राप्त अंग भी लगवा लिया जाता है••• किन्तु  जिस तरह मूलभूत प्राकृतिक अंग    के स्थान पर प्रतिस्थापित अंग सीमित उपयोगी है! वैसे ही  स्थानापन्न रिश्तों को मूलभूत जैसा कभी नहीं बनाया जा सकता!

कुछ रिश्ते, जन्म से ही, नैसर्गिक रूप से, हमें बने बनाये मिलते हैं••• हमें उन रिश्तों को केवल निभाना होता है••• शेष रिश्ते हम स्वयं अर्जित करते हैं!
चाहे जन्म से बने रिश्ते हों और चाहे अर्जित किये हुए••• निभाने के लिये सामंजस्य चाहिए होता है! सामंजस्य के लिए निःस्वार्थ,  अनुराग,  त्याग व सहिष्णुता!

*जिसमें सामंजस्य की क्षमता विकसित हो गई वह रिश्तों में धनवान हो गया•••*

वह जनप्रिय होकर, लोकप्रिय होता/ होती है!

वह जननायक/ जननायिका हो सकता/सकती है!

हरि ऊँ!

-सत्यार्चन 

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