अशांत मन !

अशांत मन!

(पुनर्लिखित एक पुरानी रचना )

शांति की खोज में
भटकता रहा में
यहाँ वहाँ…
जाने कहाँ-कहाँ…
गांव-गांव, नगर-नगर
बस्ती -बस्ती , डगर-डगर!
वन -उपवन-मधुवन
हर कहीं कोलाहल
हर ओर कृन्दन!
उद्वेलित करते जटिल प्रश्न
अब भी ना था हुआ शमन !
आखिर में अशांत मन
जा पहुँचा ‘शांतिवन’
ज्वालायें थीं चिताओं में
निष्तब्धता को चीरकर
मुझे कह गई कोई चिटकन
नहीं कोई किसी का है सत्य वचन
राहों में बिछाये क्यों चितवन!
छोड़छाड़ तू सब भटकन
बस स्थिर कर ले अपना मन!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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