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आज सूखा पत्ता हूँ! 

आज सूखा पत्ता हूँ!

हरा था तो पोषक था 

आज सूखा पत्ता हूँ! 

जानता हूँ हरे पत्तों के बीच 

आज नहीं जँचता हूँ! 

दोष तुम्हारा नहीं 

है प्रकृति का नियम! 

कोई साख नहीं संजोती

कभी किसी सूखे पत्ते को!

जानते हो क्या मगर कि

उड़ाये ना जायें अगर•••

तेज हवा झंझावात में 
 सूखे पत्ते तब भी 

अपना फर्ज निभाते हैं! 

जड़ों में जमकर खाद बन जाते हैं! 
पालक-पोषक मिट कर भी 

पोषण धर्म निभाते हैं! 

आँधियों में उड़कर भी 

धर्म भूल पाते नहीं 

मिटते हैं जहाँ भी

 जब भी

बनते हैं  खाद ही!
– सत्यार्चन सुबुद्ध

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