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आत्मावलोकन 

मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग दूसरों के आंकलन, मूल्यांकन में ही जीवन गुजार देते हैं! अपने आपका और अपनों का मूल्यांकन करने की सोचते तक नहीं! केवल दूसरों में  निकाल दुःख का कारण खोजते रहते हैं और आजीवन दुखी रहते हैं! जबकि सुख का मार्ग ‘स्वमूल्यांकन-सेतु’ से होकर  ही जाता है! 

चंद गिने चुने लोग ही अपना और अपनों का मूल्यांकन करते भी हैं तो ईमानदारी से नहीं कर पाते! 90% अधोमूल्यांकन के बीमार हैं! उनसे बहुत अधिक दुखदायी 9•9% उपरिमूल्यांकन से ग्रस्त हैं! 

*वास्तविक स्वमूल्यांकन-सक्षम (आत्मावलोकनकर्त्ता) केवल  0•1% या उससे भी कम हैं! 

अपना उचित मूल्यांकन (आत्मावलोकन) तभी संभव है जब आप अपने आपको, अपने आप से बाहर निकल, तटस्थ रह देख सकें! 

हरि ऊँ! 

-सुबुद्ध सत्यार्चन

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