आपने कितना किया विषपान?

आपने कितना किया विषपान?

अपनी अपनी नज़र है और अपना अपना नजरिया…
मुझे तो बिषपान के नाम से, सौम्य शांत किंतु क्लांत …. भोले भाले त्रिनेत्र शिव-शंभु… ही दिखते हैं…!
विषपान करने वाले बाबा शिव शंभू ने समुद्र मंथन में भयंकरतम, महाविष/ हलाहल से भरे घड़े को पूरा का पूरा कंठस्थ कर लिया था और शेष देव-दानवों को महाविष के प्रभाव से बचा लिया था… !

क्या ऐसा चमत्कार कहीं और भी दिखता है…?
मुझे लगता है कि हर कहीं दिखता है हलाहल को अपने कंठ से बाहर ना आने देने वाले अनेक अनीलकंठ रहते हैं हमारे आसपास, हमारे साथ, हमारे बीच, हममें से ही बहुतेरे इसी तरह के बिषपायी हैं…

महर्षि बाल्मीकि को भी इसी प्रकार के समुद्र मंथन के से समय ज्ञान प्राप्त हुआ था। जब, आगत हलाहल में भागीदारी करने से परिजनों ने भी मना कर दिया था… किसी भी साझीदार के ना मिलने पर प्राप्त ज्ञान ने बाल्मीकि जी को महर्षि बनने का कारण उपलब्ध कराया था….!

क्या सम्पूर्ण जीवन चलने वाला संघर्ष समुद्र मंथन सा नहीं… और जीवन के संघर्ष में प्राप्त शुभाशुभ / अमृत बिष, रत्न, कामधेनु, आभूषण, शस्त्रास्त आदि ठीक समुद्र मंथन के उत्पाद सदृश नहीं होता ?

समुद्र मंथन के समय विवेकातिरेक (चालाकी) से बासुकी की फुंफकारों का सामना करने तो देवों ने दानव दल को मना लिया किन्तु नियति ने न्याय कर पुनः देवों की ओर ही महाविष पहुंचाया..! साथ ही.. रत्न निकले तो लालच भी… सबसे मूल्यवान अमृत ने तो समझौते का अंत ही कर दिया … अमृत छीनने, धैर्य त्याग द्वंदोत्यत तक हो गये थे दोनों ही दल…
ऐसा ही तो है जीवन संग्राम जहां हर मुखिया चाहे वह स्त्री हो या पुरुष…. समुद्र मंथन से निकलते रत्नों, व्यंजनों आभूषणों को सहर्ष सबको बांटता रहता है किन्तु जब-जब बिषकुम्भ निकलता है उसे अकेले ही कंठस्थ करना होता है…!
कहीं ना कहीं संसार के हर बड़े-बुजुर्ग को, कभी ना कभी शिव-शंभु भोले बाबा के आदर्श, ‘महाबिष पात्र’ को अकेले कंठस्थ करने पचाने का पालन करना ही होता है…!
आपने कितना किया विषपान ?
-सत्यार्चन सुबुद्ध

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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