आब को बेताब दरिया!

आब को बेताब दरिया! 

जिन्दगी जीने की तो भरपूर कोशिश  की गई•••

जिन्दगी ने ठानी ज़िद फिर किसी तरह ना जी गई! 

प्यास थी, पानी नहीं था, बाकी की मिन्नत की गई•••

पत्थरों के थे शहर सारे हमसे ना जिल्लत पी गई!

 दिल की लगी क्या बेदिलों से, दिल्लगी दिल से हो गई !

आब को वेताब दरिया, प्यास प्यासी रह गई!

बरस दर बरस बरसा सावन, सैलाब आये-गये बहुत 

 सूखे या डूबे कुएँ आस के, आस! आस ही रह गई!

कैसे निभाते साथ तेरा, छिटके हाथ से तुम जब-तब

बात की बात में बनती बातें, अनकही बात ही रह गई 

काटे कटी ना, काटी कैसे, किसी से कोई कैसे कहे

उजड़ी सुबहें, उखड़ी साँझें, बदरंग रात ही रह गई! 

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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