‘उन्मुक्तता’

‘उन्मुक्तता’ (एक लघुकथा!)

एक बार फिर वही होटल का कमरा, वही मादक संगीत… वही शराब… वही  कालगर्ल रेखा… विवेक की बांहों में थी…
रेखा की गर्दन और उसकी लंबी घुंघराली लटों के बीच से हाथ निकाल विवेक ने पैमाना खाली किया तो झट से वो इठलाती हुई उसकी बांहों से फिसलकर निकली… बार टेबल से खाली पैमाना भरकर फिर से विवेक की गोद में ऐसे लेट गई  जैसे बाथरूम में पानी भरे टब में जा समाई हो…

कम गाढ़ा हो तो अंजुरी असमर्थ…! रिसता ही है…!

विवेक उसे यहां वहां छूते हुए उससे छेड़छाड़ भरी बातें कर रहा था… विवेक लम्बे समय से रेखा का नियमित ग्राहक था… वो रेखा की खूबसूरती, उसके मैनर्स, एटीकेट्स से काफी प्रभावित था… वो उसे कालगर्ल से अधिक करीबी दोस्त की तरह मेहसूस करने लगा था… सुरा के शुरूर में तो शायद मनचाही हूर… इसी बीच विवेक ने मुस्कुराकर उसका दुपट्टा हाथ में लपेटते हुए शिकायती लहजे में पूछा

“तूने ये दुपट्टा ओढ़ना नहीं छोड़ा ना… मैंने कहा था ना कि… मुझे तू बिना दुपट्टे के ज्यादा अच्छी लगती है…. मैंने लाल सेंडिल को भी मना किया था यार… तू ये मत पहना कर … … ‌ … अच्छा ये बता … तुझे पता है ना… तुझे याद है इतने सालों में मैंने तुझे मेरे पास आते हुए जो जो ना करने को कहा हो… और तूने उसमें से कुछ भी मानकर ना किया हो? इतने सालों से मैं…. तेरे सिवा किसी को नहीं बुलाता तुझे ही याद करते आ रहा हूं…  और तू है कि… हां तो हर बार कर देती है… पर मेरे लिए… मेरा जरा सा कहा करके नहीं दिखा सकती…क्यों ? …? ….?”
“यार तुम शायर हो …  समझदार लगते हो…. मगर इतनी सी बात भी नहीं समझ पा रहे हो…. ‘शायर साहब’ कि अगर किसी का कहा ही करना होता…. किसी के कहे में ही चलना होता… मैं कर पाती…. तो क्या मैं कालगर्ल होती?”

एक कालगर्ल/ मैनर्ड वैश्या से ऐसी फिलासफी सुनते ही विवेक का नशा काफूर हो गया….!
उसने रेखा को चलता किया… और डायरी उठा लिखने लगा…
‘नारी में उन्मुक्तता की उत्कंठा’ कितनी तीव्र हो सकती है और उस उन्मुक्तता के  परिणामों के दृश्यों से, परिचित कराने वाली उस कालगर्ल से ‘ज्ञानप्राप्ति के बाद’  विवेक फिर उससे कभी नहीं मिला….!
-सुबुद्ध

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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