काश्मीर पर विवाद? कैसा विवाद!

काश्मीर पर विवाद? कैसा विवाद!
कश्मीर ना विवाद का विषय था ना है….
1947-48 तक
काश्मीरी राजा की उच्चाकांक्षा /अनिर्णय की स्थिति कारण काश्मीर का विलय भारत या पाकिस्तान में से किसी में भी होने से रोके रखा… भारत बातचीत के रास्ते काश्मीर को अपने साथ लाना चाहता था कि उग्रवादी पाकिस्तानी सोच के पहले दुष्परिणाम के रुप में, काश्मीर पर कबाइली आक्रमण हुआ … तब विवश होकर काश्मीर ने भारत के साथ होना स्वीकार किया….! अलग पहचान और अलग निशान की मांग के साथ…! दोनों मांगें अस्थाई रूप से, लिखित बताकर मान ली गईं…!

तब के और आज के वैश्विक परिदृश्य में बड़ा परिवर्तन आ चुका है अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रेलिया सहित विश्व के लगभग सभी देशों में किसी भी देश के टेलेंट और निवेशकों को बसाने की होड़ मची है तब अगर कश्मीर में शेष विश्व आना भी चाहे और वहां के लिए बनाया गये अस्थाई, ‘भारतीय’ विधान से रास्ता रोक लिया जाये तो भारत काश्मीरियों का हितैषी तो नहीं कहला सकता था …

अतः आज की पारिस्थितिकी के अनुरूप अस्थाई व्यवस्था समाप्त कर काश्मीर को वैश्विक बनाया गया तो इसमें काश्मीर का ही हित है… जहां तक बाहरी लोगों के आने से काश्मीरियों के टूरिज्म व्यवसाय पर प्रतिकूल असर का प्रश्न है वह उस नुकसान से बहुत कम है जितना पाकिस्तानी दुष्प्रचार के बहकावे आकर काश्मीरी अभी तक अपने आपको मटियामेट कर चुके हैं…!

जहां तक पाकिस्तानी दखल का प्रश्न है तो पाकिस्तान को 1947 से अब तक के काश्मीर में दखल के अधिकार का आधार ही क्या है?

1947 पूर्व के काश्मीरी राजा ने मुसीबत के समय स्वत: पाकिस्तान की जगह भारत में विलीन होना चुना था…

तब तक अंतरराष्ट्रीय समझौतों के आधार जनमत संग्रह तो नहीं थे…. पाकिस्तान ‘वर्षों के दुष्प्रचार के बाद’ जनमत संग्रह की मांग उठाते आया है…. अब पाकिस्तानी दुष्प्रचार पर लगाम लगा दी गई है … तो शायद अब 10 साल से अधिक नहीं लगने वाले आम काश्मीरियों को भारत पाक को तौलने की समझ आने में फिर भारत स्वयं जनमत संग्रह कराकर वैश्विक पटल पर रखने की स्थिति में होगा… !

तब तक खिसियानी बिल्लियां चाहें तो खम्भे नोंचते हूए अपने पंजे लहूलुहान करती रहें या शांति से अपने विकास पथ पर बढ़ती जायें!

हर भारतीय की तरह काश्मीरियों को दुर्दशा से उबारने वाले इस कदम से मैं भी अत्यंत हर्षित हूं!
-सत्यार्चन सुबुद्ध

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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