कृष्ण या सुदामा?

कृष्ण या सुदामा?

जाने कब से आंखें नीर हीन हो चुकी थीं…! जाने क्या क्या बीत गया … जाने क्या क्या छूट गया… मगर आंखों में आंसू ना आये थे वर्षों बीत चुके थे पत्थर हुए… !
अचानक श्री कृष्ण-सुदामा मिलन का  वीडियो क्लिक किया… और अपने आपको वीडियो में दोनों ओर देख… निरंतर भावविह्वलता में अश्रुधार चल निकली… समाप्त होने पर भी रुकने तैयार नहीं … बाॅंध जो टूट गया था आज…! श्रीकृष्ण और सुदामा; मुझे दोनों में, मैं ही दिखते रहे…
लोकोपहास से तो अब कभी असहजता नहीं होती …. आदत जो हो गई है…. मुझे हर बार पता होता है कि जरा सी देर में द्वारकाधीश दौड़े चले आने वाले हैं… और लोकदृष्टि पलक झपकते बदल जाने वाली है… कोई आज की बात तो है नहीं…  कब से देखते आ रहा हूं…. एक-दो बार नहीं बार बार… हजार बार….  निराशा में कदम वापस मोड़ने से पहले श्रीकृष्ण दौड़े चले आये हैं… 
महल में बैठा हुआ अन्दर वाला ‘मैं कृष्ण’ भी जानता हूं… कि अपने वैभव के मान के उबाऊ बोझ से मुक्त कराने किसी भी दिन….  किसी भी पल द्वारपाल आकर…  शायद बस अभी अभी आकर मुझे मेरे बचपन के उच्छृंखल, बेतकल्लुफ़ आल्हादमय पलों   में ले जाने का कारण बनने….   सुदामा के आगमन की सूचना देने ही वाला है…  मुझे उबाऊ जीवनचर्या से सस उबारने ही वाला है… सुदामा को मेरा उल्लास लौटाने का माध्यम बनना ही था ….  आना ही था…!
‌मित्रों में ना मांगना पड़ता है…. ना बोलना …. बस उसकी जरूरत पता चल जाती है…! फिर कौन कृष्ण कौन। सुदामा पता ही नहीं चलता…. बस मित्र को मित्र की आवश्यकता का भान हो जाता है और मित्र दसियों कोस से चलकर…. दाता होकर भी याचक बनकर वो  देने आ ही जाता है…  जो मुझे चाहिए…. मैं पा लेता हूँ ….  जो मेरा अभीष्ट है…. साधिकार पाता हूॅं…  ना तो मैं उस प्राप्ति का मूल्यांकन करना चाहता हूं ….. ना कर सकता हूं….  ना चुकाने की सोचता हूँ… ना ही चुकाने में सक्षम हूँ… ना ही चुका सकता हूं….  किन्तु उसकी आवश्यकता योग्य जो हो सके करने का प्रयास अवश्य  कर सकता हूँ… करता हूँ…
‌वास्तव में कृतज्ञ तो मैं हो रहा होता हूँ …. और कृतज्ञता वो ज्ञापित कर रहा होता है ….
यही तो लीला है…. मित्रवत्सल परममित्र लीलाधर की … जो किसी किसी के ही पल्ले पड़ पाती है….!
नटखट-नटनागर-मुरलीधर-किशन कन्हैया की अमिट स्मृति अनायास सजीव अवतरित हो उठी है….
हरि ॐ!
-सुबुद्ध !

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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