क्या किये! 

जोखिमों से सदा ही डरकर जिये तो क्या जिये!

जीने से पहले, मरे अक्सर… यूं मरे तो क्या जिये।

मौत आयेगी तो, सच है, तब मरना होगा …

पर मौत के आने से पहले, हर दिन मरे, तो क्या जिये!

आस के बादल तो थे, ठहरते तो बरसते•••

धीर धर ना सके तुम, चल दिये तो चल दिये!

बीती, बीत गई कबकी, ना मन से गई बिताई•••

बीती के भरे विष प्याले, नित-नित पिये तो क्या पिये!

दर्द ना देखा हो जिसने, ऐसा कोई हुआ नहीं…

आजीवन पीते रहे दर्द, जिये दर्द ही तो क्या जिये!

बाग थे, बहारें थीं, मन घर किये मगर पतझड़…

मौजों में कभी झूमे नहीं, यूं गमगीं जिये तो क्या जिये!

दावतें थी यारों की, मयखाने थे, थीं महफिलें…

बिन हँसे, बिन मुस्कराये, गुमसुम जिये तो क्या जिये!

शब भी थी, सुराही भी, थी हसीन साकी भी,

ना ढाला कभी ना छलकाया, फिर प्याले पिये तो क्या पिये!

ना बहके, ना लड़खड़ाये, ना उठाकर यार घर लाये…

अनगिन पिये प्यालों पे प्याले, यूँ पिये तो क्या पिये!

-सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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