क्या कुरीतियां त्याज्य नहीं ?

क्या कुरीतियां त्याज्य नहीं ?

क्या कुरीतियां त्याज्य नहीं ? 08/09 फरवरी 2020, मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को,  हमारे पूज्य पिताश्री परलोकगमन कर गये हैं! दिवंगत की आत्मशांति हेतु हम सर्वाधिक उपयुक्त सनातन शास्त्रोक्त विधि का अनुपालन करना चाहते हैं! हम धार्मिक विधियों का तो भलीभाँति अनुपालन करना चाहते हैं किन्तु कुरीतियों का नहीं! धार्मिक कृत्य हो और कुरीति या रूढ़िवादिता ना हो के लिये दोनों को जानकर ही दोनों में भेद करना संभव हो सकता है! धार्मिक कृत्य (या धर्म) वह है जो देश, काल तथा परिस्थिति के अनुरूप सर्वथा उचित तथा अनुकरणीय हो! तो फिर रूढ़िवादिता या कुरीति क्या है? कुरीति वह है जो किसी जो देश, काल, परिस्थिति विशेष में सर्वथा उपयुक्त होकर धर्म था या है किन्तु अन्य देश, काल या परिस्थिति में अनुपयोगी तथा असंगत हो! दूसरे शब्दों में सुयोग्य पुरोहित की अनुपस्थिति में, देश, काल तथा परिस्थिति को तार्किक दृष्टि से विचारे बिना, किसी अल्पज्ञानी द्वारा किया जाने वाला रटारटाया धर्माचरण ही कुरीति है! जैसे कि मेरी वर्तमान परिस्थिति में आसन्न मृत्यु भोज को ही ले लीजिएगा! कभी ना कभी तो यह रीत धर्म रही ही होगी अर्थात् उपयोगी रही होगी! जिसका रीति निर्वहन के नाम पर हम सब आज भी अंधानुकरण करते जा रहे हैं? बिना परिवर्तित समय के अनुरूप परिवर्धित किये! आइये थोड़ा सा फ्लेशबैक में चलकर इस रीति के धर्म फिर कुरीति या रूढ़ि बनने के संभावित सूत्रों को जानने, पिछली शताब्दियों में चलते हैं! ईसवी सन् 1800 और 1900 की सदी का भारतीय सामाजिक इतिहास लगभग यथोचित उपलब्ध है ही!  तब केवल 0•1 % अति सक्षम को छोड़कर शेष भारतीयों (सनातनों) की सामाजिक स्थिति कुछ ऐसी थी कि-  95% भारत छोटे छोटे गाँवों में बसा हुआ था! लगभग सभी भारतीय सनातन संस्कृति के अनुयायी थे! तब सनातनों के अपने, रिश्ते, नाते, कार्यव्यापार सब कुछ 10-20 किलोमीटर की परिधि में ही हुआ करते थे•••! धीरे-धीरे विकास क्रम में अपनों के निवास के बीच की दूरियां बढ़ती गईं। पहले 1-2 जिलों के अंदर, फिर 1-2 प्रदेश के तक फिर सारे भारत तक और अब सारी दुनियां में फैले हुए हैं रिश्तेदार••••! पिछली सदियों में तो अधिकृत चिकित्सकीय साधन भी नगण्य से उपलब्ध थे, व्यक्तिगत और आवासीक सुचिता का कारण भी धर्माचरण ही था! जो स्वास्थ्यकर भी था! जबकि महामारियों की निरंतर आवृत्ति भी थी!तब धर्माचरण ही सबसे बड़ी आशा और सबसे बड़ा सहारा भी था! क्योंकि तब स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, आवासों की आंतरिक तथा बाहरी साजसज्जा सहित स्वच्छता, सामाजिक संरचना तथा व्यवस्था, सबका आधार धर्म ही था•••! उन स्थितियों में जब अपनों का भौगोलिक विस्तार जिले की सीमा तक ही था, तब डाक व्यवस्था सहित संचार के साधन जनसाधारण को उपलब्ध नहीं थे। तब जनसाधारण केवल संदेशक को भेजकर/ स्वयं मिलकर ही सूचना देने, श्रद्धांजलि और शोक संवेदना प्रकट करने में सक्षम था! तब संदेशक के सबको सूचित कर वापस लौटने से सबके आ पहुंचने तक के सुविधाजनक समय की अनुमानित गणना अनुसार 11वें-13वें दिन, शौक-श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया जाता था•••! फिर विकास क्रम में दूरियां बढ़ती गईं तो परिवहन और संचार के साधन भी बढ़ते गये••• ! सन् 1900 की सदी के शुरु तक तो विदेश गये ‘स्वजन’ के सकुशल या जीवित होने की सूचना भी उसके वापस लौटने पर ही मिला करती थी••••! किंतु अब जब संचार के साधन इतने समृद्ध, परिवहन मंहगा तथा कार्य के घंटे इतने कीमती हैं  कि रीत निभाने की जरूरत, रोजगार  पर भारी पड़ रही हो••• क्या तब भी उसी रीत का वैसा ही अनुपालन अर्थात् अंधानुकरण उचित है? क्या उतना ही उचित है जितना कि सन् 1800-1900 की सदी में था?
आज जब श्रद्धांजलि व संवेदना प्रकट करने के अनेक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हैं! कुछ मैं भी प्रस्तावित करने जा रहा हूँ और अन्य अनेक और भी किये जा सकते हैं••• निकाले जा सकते हैं! क्या तब भी इस रीत का वैसा ही अनुपालन उचित है?
इस विचार को केवल भोजनखर्च बचाने की दृष्टि से देखा जाना, पहली प्रतिक्रिया तो हो सकती है किन्तु क्या इसमें उन अनेक आगंतुकों को असुविधा, असुरक्षा और अपव्यय से बचाना सम्मिलित नहीं? हम पहले ही निश्चय कर चुके हैं कि त्रयोदशी पर कर्मकांड अनुसार केवल आगंतुकों/ परिजनवत बंधुबांधव मित्रों, परिचितों/ अतिथियों/ आमंत्रितों/ निर्धनों / निराश्रितों /ब्राह्मणों  (न्यूनतम 13) को ही उचित भोजन कराना चाहेंगे! अर्थात् स्टेटस सिंबल बनाये जाते 2-4-5 स्वीट्स की गिनती से दूर यथोचित आवश्यक भोजन व्यवस्था ही करेंगे!
आज से गरुड़पुराण होने जा रहा है जो कथाश्रवण का लाभ उठाना चाहें उनका स्वागत है!
हम कर्मकांड का (धार्मिक विधि का) पूरी तरह अनुपालन करेंगे किन्तु अन्य किसी भी प्रकार का कोई समारोह, आडम्बर पूर्ण भोज आदि नहीं होना चाहिए••• अतः नहीं होगा! ऐसा कुछ निश्चय किया है! 
*पिताश्री की इच्छा के अनुरूप बहुत पहले से लिये गये मेरे इस निर्णय में आप सब से सहयोग अपेक्षित है! निर्णय मेरा है, और मैं अपने इस निर्णय से संभावित अपयश का सामना करने पूरी तरह तैयार हूँ!*
मेरे अतिरिक्त दिवंगत की शेष संतानों की भी या तो इसमें सहमति है या वे असहमति जता नहीं पाये! मैं उनसे भी उनका अभिमत जानना चाहता हूँ!
मुझे लगता है कि इस कुरीति अवरोधक  निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए!
कभी ना कभी किसी ना किसी को तो कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होने का साहस करना होगा••• तभी कुरीतियों का अंत संभव है!

*तो हम क्यों नहीं?*

ऐसा भी नहीं है कि मैं ही यह शुरुआत कर रहा हूँ ••• मैं केवल एक अच्छी पहल का अनुसरण मात्र कर रहा हूँ!
मेरी जानकारी में तो इस विचार के जनक मुंशी प्रेमचंद जी हैं जिनकी 2-3 कहानियों में यह विषय लगभग 1 शताब्दी पहले उठाया गया है! (‘कफन’, ‘मधुआ’) ! मध्य भारत के विदर्भ में, स्थानीय सिंधी समाज मेमें  भी, लगभग शतप्रतिशत स्थानीय हिंदू इसे पहले ही अपना चुके हैं!

हमारे रिश्ते-नातों-परिचितों में से, 1980-90 के दसक में ही,  मेरे भांजे आशु के परदादा जी के स्वर्गवास उपरांत आशु के दादाजी ने पूर्ण सक्षम होते हुए भी ऐसा ही किया था!
जो अनुकरणीय है!
मैं भी वही करना चाहता हूँ!
मैं अपयश के भय से भयभीत नहीं हूँ!
ना कभी हुआ!
अब आप सब या तो मेरे निर्णय मैं मेरा साथ दें या मेरे निर्णय से (अपयश के अतिरिक्त होने वाली हानियां) असहमति आदि जो भी हैं, आज ही मुझे बताने का कष्ट करें! 
ताकि यदि मैं ही भूल कर रहा हूँ तो सुधार सकूँ!
19 फरवरी 2020 को त्रयोदशी संस्कार एवं 17 फरवरी को दसगात्र विधि संपन्न होगी!

*क्या कुरीतियां त्याज्य नहीं?*

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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan