क्या उन्मुक्त सशक्त है?

अनेक महिला मुक्ति संगठन एवं उनके अनुयायी प्रगतिवादी;  स्त्री के स्वातंत्र्य को उसकी वस्त्राल्पता के समानुपाती मानते हैं ! उनकी दृष्टि में सिर से पैर तक वस्त्र धारण की हुई स्त्री शोषित है!
कुछ महिला सम्मान समर्थकों को लगता है कि जिसकी देह हो उसे ही निश्चित करने का अधिकार भी हो, कि वह क्या अथवा कितने वस्त्र पहने (अथवा बिल्कुल ना पहने!)
देह के आवरण देश, काल और परिस्थिति  पर निर्भर करते हैं••• और करना भी चाहिए! 
दूरस्थ आदिम वस्तियों के वासी,  आज भी नग्न ही निवासरत हैं! उनके बीच  नवागंतुक को तो नग्नता के स्वीकार में समस्या होगी किन्तु उनको नहीं ! क्या वैसी वस्तियां अनुकरणीय हैं? या होना चाहिए?
इसी प्रकार नाइट क्लबों, पबों और कैसिनोज में भी लगभग आदिम वस्तियों जैसी ही अर्ध/ पूर्ण  नग्नता और आदिम वस्तियों सा स्वच्छंद यौनाचार  (जिसकी लाठी उसकी भैंस,  या ‘वो’ जिसे चाहे वह उसका आज का राजा हो) की परिपाटी है! अगर आज आवरण का परित्याग स्वीकार है तो कल आचरण भी अप्रासंगिक हो ही जायेंगे! 
यदि आने वाले कल में अपने अपने कुल का स्वच्छंद यौनाचार स्वीकार है तो आज की अल्पवस्त्रता अथवा निर्वस्त्रता सहर्ष स्वीकार की जानी चाहिए! 
बात ‘केवल स्त्री’ की ही नहीं••• यह प्रत्येक ‘व्यक्ति’ का  विषय है कि वह अपने यौनाकर्षण योग्य अंगों को आवरण दे अथवा आमंत्रण के प्रदर्शन हेतु अनावरित रखे! तब उसके उपलब्ध/ आवश्यकता के उन्मुक्त प्रदर्शन से उसे प्राप्त होते सामान्य व उग्र प्रस्तावों का उचित परिहार करने भी तत्पर रहना ही होगा!

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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan