क्या दिल्ली में मुफ्तखोरी ही जीती?

क्या दिल्ली में मुफ्तखोरी ही जीती?

“यदि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम-आदमी-पार्टी की जीत का कारण केवल मुफतखोरी ही है? और क्या ठीकरा फोड़ने से, उचित विश्लेषण की उपयोगिता अधिक नहीं होगी?”

दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP की जीत को  मीडिया में राष्ट्रभक्ति पर मुफ्तखोरी की जीत दिखाना और प्रचारित किया जाना उचित है? क्या सरकारी सार्वजनिक हितसाधक प्रयासों को मुफ्तखोरी ही पुकारा जाना चाहिए?  ऐसी मुफ्तखोरी का असर केवल दिल्ली में ही क्यों है?

क्या दिल्ली चुनाव परिणामों को “देशभक्ति पर भारी मुफ्तखोरी” पुकारा जाना उचित है? यदि हाँ तो देशभक्ति की परिभाषा क्या है? देशभक्ति का स्वरूप क्या है?क्या देशभक्ति केवल वर्तमान राजनेताओं को सम्मान व समर्थन ही है? चाहे वे कुछ भी करें?  मैं भारत सरकार के 2020 के बजट में लाई गई 80% योजनाओं को बहुत उपयोगी व राष्ट्रहितकारी मानता हूँ किन्तु दिल्ली राज्य सरकार ने कुछ विशेष कर दिखाया और  दूसरे दलों द्वारा अपने घोषणापत्रों में  इस  सरकार से कई गुना अधिक मुफ्त देने का वचन (या प्रलोभन)  दिया गया फिर भी जनता ने पिछली सरकार के  किये हुए विकास को ही स्वीकारा! मुफ्त बांटकर  वोट तो सभी अप्रत्यक्ष रूप से खरीद ही रहे हैं•••! चुनाव आयोग अप्रत्यक्ष खरीदी पर कार्यवाही करने में सक्षम नहीं!  न्यायपालिका विवश! फिर एकमात्र  दिल्ली विधानसभा ही है जो इतना बांटने के बाद भी••• अपना वार्षिक बजट लाभ का रख पा रही है! फिर शेष सभी  भारतीय राज्य अपूरित घाटे की अर्थव्यवस्था से क्यों नहीं उबारे जा सक रहे? क्या ये प्रश्न विचारणीय नहीं होने चाहिए???
    यदि मुसलमानों के अहित में देशहित दिखे तो देश की परिभाषा नई हो गई ना? कोई अन्य प्रकार का राष्ट्रवाद तो प्रबल नहीं दिखता! तो क्या सरकारों को जनता से वसूले टेक्स से जनता के लिये मूलभूत सुविधायें देना अनुचित है? क्या शासकीय के साथ साथ निजी स्कूलों को आमजन के लिये उपलब्ध कराना अनुचित है? क्या हर मोहल्ले में वाकिंग डिस्टेंस पर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना अनुचित है? तो फिर तो आयुष्मान योजना भी अनुचित हुई ? प्रधानमंत्री आवास योजना भी अनुचित हुई ना? तो फिर क्या सरकारों का जनता से प्राप्त टेक्स के पैसों से ऐश करना ही उचित है?

मेरी दृष्टि में तो जनता ने नफरत पोषक उद्वेलित जन भावनाओं पर सार्थक विकासवादी राजनीति को वरीयता दी जिससे #दिल्लीचुनाव परिणाम ऐसे आये हैं!

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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan