गुनाह!

गुनाह! 

मानवता को पीट-पीट कर 

मारा जा रहा था•••

वो मानव था करने लगा बीच बचाव,

उसका क्या गुनाह 

उसे क्यों मिलती नहीं पनाह 

चीखता नहीं है वो

पर रुकती नहीं कराह•••

उसके अंदर जीवित हैं  संवेदनायें 

बस यही उसका गुनाह! 

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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