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चिन्तन, चिन्ता और दुःस्वप्न! 

चिन्तन, चिन्ता और दुःस्वप्न! 

चिंतन क्या है?

संसार का प्रत्येक मनुष्य हमेशा चिन्तन में रत रहता है! किसी भी सामान्य जन का मन-मस्तिष्क कभी विचार शून्य नहीं होता! वो जो भी देखता, सुनता, छूता, सूंघता, पीता, खाता है उनके प्रति अनुभूति के लिये भी वह विचारता है!  इन पर विचारना भी चिन्तन ही है!

छोटे छोटे विषयों पर अधिकतर चिन्तन भी सूक्ष्म ही होता है! दैनंदिन विषयों, जिन पर पहले भी चिन्तन किया गया है, पर   वर्तमान चिन्तन सूक्ष्मतम होता है! एक समय के बाद परिपक्व आयु तक ऐसे विषय हमारे लिए इतने गौड़ रह जाते हैं कि इनके प्रति चिन्तन की मात्रा शून्य के आसपास हो जाती है!

किन्तु दैनंदिन से हटकर होने वाली घटनाओं, तथ्यों, अवसरों,  आवश्यकताओं, आकस्मिकताओं के समय हमारे चिन्तन की मात्रा और इसमें लगने वाला समय दोनों बड़े होते हैं! चिन्तन ना तो अनुचित है ना त्याज्य! चिन्तन इनके उपस्थित होने पर इनके सामना करने की हमारी योजनाओं को जन्म देता है! हम हमारी समझ व क्षमता के अनुसार  सर्वश्रेष्ठ योजना निर्मित करते हैं! किन्तु समझदार व्यक्ति इकलौती योजना के स्थान पर अवसर की गंभीरता अनुसार 2-3-4-5 या इससे भी अधिक योजनाओं के साथ तैयार रहता है! किन्तु अतिशय या सीमित बुद्धि वाले या अधीर मनुष्य, अपनी ही बनाई किसी भी योजना से, कभी संतुष्ट नहीं होते और एक शून्य त्रुटि वाली योजना के प्रयास में, अवसर के उपस्थित होने तक भी, कोई कामचलाऊ योजना तक को अंतिम रूप नहीं दे पाते!

उचित तो यह होता है कि ‘किसी भी अवसर के लिए सभी संभावित विकल्पों पर विचार कर सर्वोत्तम 1-2 या 3 विकल्पों को चुनकर उनके आवश्यकतानुसार अनुपालन का क्रम निर्धारण भी कर लिया जाये!

 यहाँ तक तो यह चिन्तन ही है किन्तु बारम्बार एक ही समस्या या अवसर के लिये उपस्थित विकल्पों में से किसी पर भी स्थिर ना होकर संभावित विकल्पों में से एक से दूसरे पर बार-बार घूमते रहना, खिसियाना, परेशान रहना, अन्य से सलाह लेने में संकोच करना, अन्य की सलाह पर तटस्थ रहकर विचार ना कर पाना आदि वे कारण हैं जो चिन्तन को चिंता में बदल गुण को दोष रूप दे देते हैं!

चिंतन का चिंता में बदलना क्या है?

चिंतन व्यवस्था है तो चिंता अव्यवस्था!

आगत अवसर/समस्या पर व्यवस्थित तरीके से विचार करना चिंतन है, जिसमें सभी संभावित विकल्पों में से गुण-दोष के आधार पर वरीयता क्रम में विकल्पों का चुनाव कर नोट कर लिया जाये!

हे भगवान! “….” होने जा रहा है… अब क्या होगा… और जिस भगवान का नाम लेकर सर धुन रहे हो उसी पर अविश्वास! यह चिंता है…! चिंतित मनुष्य सदैव आशंकित ही रहता है… संभावित अनिष्ट के प्रति आशंकित…!

कुछ उदाहरणों से शायद यह ठीक तरह स्पष्ट हो सके-

अनेक गृहणियाँ रसोई गैस का उपयोग करती हैं इनमें से 1ले प्रकार की गृहणियाँ रसोई गैस के प्रत्येक उपयोग के बाद गैस का रेग्युलेटर बंद करने को आदत बना लेती हैं, 2रे प्रकार की केवल रात को अंतिम दैनिक प्रयोग के बाद रेग्युलेटर बंद करने को अपनाती हैं और 3रे प्रकार की कभी रेग्युलेटर बंद नहीं करतीं. 4थे प्रकार की गृहणियाँ गैस सिलिंडर फटने की आशंका को दृष्टिगत रख रसोई गैस के प्रयोग को ही वर्जित मानती हैं.

इनमें 1ले प्रकार की गृहणियाँ स्वयं और उनका परिवार गैस सिलिंडर के फटने की आशंका से लगभग मुक्त ही रहता है! यह व्यवस्थित चिंतन के विकल्प और और उसके प्रयोग का उत्तम उदाहरण है!

2रे प्रकार की गृहणियाँ और उनका परिवार न्यून आशंकित रहेंगे! यह भी व्यवस्थित चिंतन के उपलब्ध विकल्पों  में से एक के प्रयोग का उदाहरण हुआ!

3रे प्रकार की गृहणियाँ लापरवाही की हद तक निश्चिंत हैं स्वयं अपने प्रति भी और अपने परिजनों के प्रति भी…. ये चिंतन से तक दूर हैं तो इन्हें चिंता भी नहीं होने वाली किंतु इसी परिवार को कोई सदस्य गैस सिलिंडर फटने के प्रति इतना आशंकित भी रह सकता है कि वह सो तक ना पाये!

4थे प्रकार की वे विलक्षण गृहणियाँ हैं जो संस्कारगत आशंकित ही होती हैं ये और इनका परिवार उन संभावनाओं को लेकर भी आशंकित/भयभीत रहने वाला होगा जो विरले ही घटित हो सकती हों!

इन चारों प्रकार की गृहणियों में से कोई भी अपने आप को और अपने परिवार को 100% सुरक्षा नहीं दे सकतीं  क्योंकि 1ले व 2रे प्रकार की गृहणियों के यथासंभव सुरक्षा के प्रयास के बाद भी किसी कारण से तापमान बहुत अधिक बढ़ जाने से इनके गैस सिलेंडर में फिर भी विस्फोट हो सकता है. साथ ही 1ल, 2रे व 4थे प्रकार की गृहणियाँ अपने परिवार को पड़ौसी गृहिणी की लापरवाही के कारण उसके गैस सिलेंडर में होने वाले विस्फोट से अपने घर को 100% सुरक्षित रखने में सक्षम नहीं हैं ऐसे में  वे अपने हिस्से की सावधानी के बाद शेष ईश्वर की कृपा पर निर्भर रहने में ही अपना हित देखती हैं…. और यही सर्वथा उचित भी है!

एक और उदाहरण संभाव्यता के सिद्धांत का को ध्यान में रखकर निश्चिंतता पाने का है.

एक महानगर में कार्यरत 2 सहकर्मियों में से 1ला अधिक निश्चिंत स्वभाव वाला है 2रा थोड़ा आशंकित! 1ले ने कार में एल पी जी गैस विकल्प लगवा रखा है वह 2रे को भी  इस विकल्प को चुनने की सलाह देता है तो 2रा पहले को संभाव्यता के सिद्धांत के अनुसार अपना दर्शन सुनाता है कि अपने शहर में कण से कम 1 लाख कारें होंगी, प्रदेश में लगभग 1 करोड़ और देश में लगभग 10 करोड़ जिनमें से औसतन हफ्ते में एकाधिक कार के जलने की खबर हमें सुनने मिलती है और ऐसी जलने वाली कारों में 90% जुगाड़ के गैस कनेक्शन सिस्टम वाली होती हैं … तो यदि स्तरीय  एल पी जी गैस सिस्टम लगवाया जाये तो हम इतने बदकिस्मत तो नहीं कि हमारे साथ ही ऐसा हो…. और अगर हैं तो पेट्रोल टैंक भी जल उठेगा… 2रे ने दूसरे ही दिन निडर होकर अपनी कार एल पी जी गैस चालित करा ली…!

चिंतन की विकृति बनी चिंता का दु:स्वप्न बनना-

मशीनी या दैविक आपदाओं की आवृत्ति उतनी नहीं है जितना उनके प्रति मनुष्य आशंकित रहता है. विभिन्न कारणों से अनेक लोग स्वभावत: आशंकित और भयभीत हो जाते हैं ऐसे लोग पर्यटन का आनंद उठाने के उद्देश्य से घर से बाहर निकलने पर भी सारी यात्रा भय के साये में कर रहे होते हैं और पर्यटन का वास्तविक आनंद उठा ही नहीं पाते. वे चाहे नाव, स्टीमर, क्रूज, बस, ट्रेन या प्लेन किसी में भी यात्रा कर रहे हों सम्पूर्ण यात्रा में उस वाहक के दुर्घटनाग्रस्त होने के भय/आशंका से स्वयं को एक पल भी दूर नहीं कर पाते. ऐसे लोग यात्रा में ही इतनी मानसिक थकान ले चुके होते हैं कि विहंगम से विहंगम दृश्य का आनंद उठाने लायक ऊर्जा अपने अंदर शेष नहीं पाते. ऐसे लोग भयवश प्रति पल अपने आराध्य को तो भजते  रहते हैं किंतु अपने उसी आराध्य में विश्वास रख आश्वस्त होने के स्थान पर उसके प्रति भी आशंका से रिक्त नहीं रह पाते. ऐसे लोग सदैव स्वयं भी चिंतामय रहते हैं और अपने निकटजनों को भी चिंतामुक्त देख आहत होते रहते हैं, वे चाहते हैं कि उनकी चिंता में सभी निकट जन भी पूरी गंभीरता से चिंतित रहें , कोई आनंद या उत्सव का आयोजन उनके आसपास ना हो, ना ही उन्हें किसी उत्सव में सम्मिलित होना पड़े. धीरे-धीरे ये लोग समाज से कट जाते हैं. फिर निकटजनों से भी दूरी बनाने लगते हैं… इन्हें हर अच्छे से अच्छे विचार, घटना, तथ्य, उपहार, उत्सव, व्यक्ति,  में भी खोट निकालने की आदत हो जाती है. किसी भी घटना, अवसर या व्यक्तित्व का आकलन बिना पूर्वाग्रह करना इनके लिये संभव नहीं होता. ऐसे लोगों का आवास यदि चलती हुई रोड के किनारे पर हो तो वे हर समय किसी ना किसी वाहन के घर में घुस आने की आशंका से ही ग्रसित रहेंगे. बादल गरजते ही अपने या प्रियजनों के ऊपर बिजली गिरने की कल्पना से भयग्रस्त हो काँपने लग जायेंगे. ये लोग सदैव उत्सव में भी शोक की आशंका से ग्रस्त रहते हैं. इन्हें प्रति पल किसी ना किसी अनिष्ट की आहट सुनाई देती रहती है. वास्तव में ऐसे लोग मानसिक अस्वस्थ होते हैं. इन्हें चिकित्सा और / या परिजनों का धैर्य पूर्वक प्रोत्साहन वाला संतुलित व्यवहार ही सामान्य बनाने में सहायता कर सकता है.

यह एक कटु सत्य है कि  “संसार में कोई भी; कभी भी अपने आपको व अपने स्वजनों को मशीनी या दैविक आपदाओं से पूरी-पूरी सुरक्षा देने में समर्थ नहीं हैं, संसार का सर्वाधिक संपन्न व्यक्ति भी उचित  सावधानी या तैयारी के बाद ईश्वरेच्छा पर ही निर्भर रहता है.” 

संसार का हर एक व्यक्ति किसी ना किसी आशंका से कभी ना कभी आशंकित अवश्य होता है… बल्कि होता ही रहता है… किंतु उस आशंका को दूर करने का मार्ग खोजने वाला सुखी व सफल जीवन जीता है. अपनी आशंका को पाल-पोष कर चिंता में बदल उसी में घुलते रहने वाला असफल और दु:स्वप्न बना लेने वाला अपना जीवन नारकीय बना लेता है.

इसीलिए प्रत्येक घटित, व आगे घटने वाले निर्धारित या अनायास उपस्थित हुए अवसर या आपदा के समय संयमित, संतुलित व  व्यवस्थित विचार कर उचित योजना बना उसपर चलने के प्रयास के अतिरिक्त शेष सबकुछ अपने आराध्य/ ईश्वर/ ख़ुदा पर छोड़ना ही सर्वोत्तम है. यह नहीं भूलना चाहिये कि “ईश-कृत” (“एक्ट आफ गाड”) से सुरक्षा देने में बीमा कंपनियां भी सामान्यत: असमर्थता ही जताती हैं. यानी “ईश-कृत” या प्राकृतिक को लगभग हर देश का कानून भी मानता है और उसके आगे सभी देशों की सरकारें तक विवश हैं तो उसके द्वारा किये जाने वाले कोप से बचने की योजना बनाते रहने में स्वयं को परेशान रखने में कौन सी समझदारी है?

जीवन देकर जिस सर्वोपरि ने जीने का, जब तक का, जितना अवसर दिया है, तब तक, प्रत्येक पल को भरपूर जिया जाये, कम से कम तब तक के लिये तो भरपूर जिया जाये जब तक कि उसकी मर्ज़ी है… क्योंकि जब उसकी वापस बुलाने की मर्ज़ी होगी तब सबकी सारी ताकत, सारे साधन, सारी सुविधायें, सारी योजनायें धरी की धरी रह जानी हैं.

उस सर्वोच्च की सत्ता के प्रति आशंकित ना हों! उचित तैयारी (सावधानी) रखें और निश्चिंत रह भरपूर जियें!

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