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चिर तरुण सागर जी महाराज 

चिर तरुण सागर जी महाराज  

मेरी, मुझसे और जग से पहचान कराने के वास्तविक अधिकारी परम पूज्य मुनि श्रेष्ठ श्री श्री तरुण  सागर जी महाराज को श्रद्धांजलि!

  आदरांजलि!

 उनके चिर तरुण हो सकल ब्रम्हाण्ड में व्याप्त होने पर समझ नहीं पा रहा हूँ कि शोक करूँ? 

क्यों करूँ? 

वे अनंत थे! 

अमर हैं! 

अमर रहेंगे! 

आपके हमारे आडम्बररहित  सदाचारों में विद्यमान रहें••• सदैव आप••• हे मुनि श्रेष्ठ!  

“परमादरणीय के साथ का संस्मरण” 

‘चिर’ तरुण सागर जी महाराज के  सान्निध्य में एक दिन••• एक उपलब्धि! 

मैं भोपाल के अपने किराये के घर के लाॅन में बेमन से पौधों की देखभाल की कोशिश कर रहा था••• तभी मेरे दोस्त का बेटा (और बेटे का दोस्त भी) म• बघेल, रायसेन से आ पहुँचा••• अभिवादन आदि के बाद  बातचीत में पता लगा कि उनके रायसेन के नवनिर्मित मकान में मुनिश्री तरुण सागर जी विश्राम हेतु पहुँचने वाले हैं! उस वर्ष (2009 में)  मुनिश्री भोपाल में चातुर्मास करने वाले थे भोपाल से पहले का अंतिम पड़ाव रायसेन में  था! उन दिनों मैं अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे स्वीकृति की प्रतीक्षा में कठिनाई भरे दौर से गुजर रहा था! लेखन से भी 20 साल से नाता तोड़ रखा था मैंने किन्तु अपने 1989 के एक लेख “मेरा राज देश पर तो देश का दुनियाँ पर” (इसी ब्लाॅग पर संक्षिप्त रूप में  “हमारा राज देश पर तो देश का दुनियाँ पर”) की बिषयवस्तु से देश के वर्तमान योग्य कर्णधारों को अवगत कराना चाहता था! बीते दिनों कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेता, ऋषि, मुनि भोपाल पधारे थे, उन सबसे मेरा मिलने का प्रयास विफल रहा था! मुझे लगा जैसे मेरी लाॅटरी ही निकल आई है! मुनिश्री तरुण सागर जी महाराज से अधिक उपयुक्त कोई हो ही नहीं सकता था जो मेरी मानवता को पुकार को स्वर दे  आगे बढ़ाये! मैंने तुरंत बाइक में पेट्रोल की व्यवस्था की और रायसेन (55 कि मी दूर) मुनिश्री के समक्ष जा पहुँचा!

*मैं आश्चर्यचकित था कि विश्व प्रसिद्ध चिंतक व समाज सुधारक से मिलना इतनी सहजता से हो सकता था!*

विगत 20 सालों से मैं अपना लिखा हुआ 10 पन्नों  का आलेख जिम्मेदारों तक पहुँचाने परेशान हो रहा था आज महाराज जी से उस पर आशीष की प्रार्थना करने वाला था!

मैं उनके सामने उनके आभामंडल   के अति प्रभाव में सम्मोहित सा बैठा हुआ था! 3-4 घंटे उनके कक्ष में साथ था! “मनोवार्तालाप” (निःस्वर संदेश प्रेषण व ग्रहण करना/ टेलीटाॅक) से तब मैं थोड़ा बहुत ही परिचित  था! उन्होंने मुझसे मंतव्य पूछा तो मैंने अपने आलेख के टाइप किये हुए 8-10 पन्ने उनके चरणों में रखते हुए (सस्वर) निवेदन किया

“आप धर्म, समाज, मानवता के मार्ग दर्शन के लिये सम्पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं राष्ट्र को भी उचित दिशा देने भी अपना आशीष दीजिएगा! मैंने इन पन्नों में राष्ट्र के दिग्भ्रमित होकर दुर्दशा में पहुँचने के कारण व सम्भावित  निवारण लिखे हैं आप एक दृष्टि डाल आशीषित कर दीजिए!”

मुनि श्रेष्ठ ने पूछा

“आपका नाम पता नंबर लिखा है इसमें?”

“केवल उपनाम लिखा है•••(“चर्चित चित्रांश”) पता नहीं••• प्रसिद्धि की कामना भी नहीं है! केवल जनोत्थान में योगदान की आकांक्षा है!”  

मुनिश्री ने आदेश दिया

” फिर भी लिख दो और वहाँ रख दो हम बाद में  देखेंगे!”

पर्यावरण समर्पित होने के कारण  मैं हर तरह की छपाई के विरुद्ध हूँ! अपनी कोई पुस्तक भी प्रकाशित नहीं कराई••• ना कराना है! समूचा स्थानीय प्रिंट मीडिया आमंत्रित भी करता रहता है! किन्तु  मैं केवल डिजिटल प्रकाशन को ही उचित मानता हूँ! हाँ लेकिन तब  मेरे पास अस्थाई विजिटिंग कार्ड था, उसे नत्थी कर  मैंने वो पन्ने वहीं उनके तख्तापलट पर रख दिये जहाँ उन्होंने कहा था! थोड़ी देर और ठहरकर मैं   वापस आ गया ! 

3 रे दिन मुनि श्रेष्ठ भी भोपाल आ पहुँचे थे! 10वें दिन शायद (8 जुलाई 2009 को) किरण वेदी जी महाराज जी के दर्शनार्थ आ पहुँची ! फिर अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित जन महाराज जी के दर्शन को आते जाते रहे!

अगस्त के पहले सप्ताह में मुझे *“सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल”* के दिल्ली कार्यालय से प्रेषित पत्र द्वारा मेरे गैर सरकारी *“राष्ट्रीय रतन अवार्ड”* हेतु नामांकित किये जाने की सूचना सहित 26 अक्टूबर को दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय युवा सम्मेलन में सम्मिलित होकर उद्बोधन का आमंत्रण भी मिला! हालाँकि व्यक्तिगत कारणों से मैं नहीं जा सका••• 

किन्तु मेरी मुझसे पहचान हो चुकी थी! 

मेरेे जीवन की अनौखी घटना जो  घट चुुकी थी

मेरे ज्ञान व विश्वास के अनुसार  केवल मुनिश्रेष्ठ के आशीर्वाद के ही कारण!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

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