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जंगली आगाज 

जंगली आगाज
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सूखे पत्तों का हश्र युगों से
एक जैसा ही हुआ होगा।
कल्पवृक्ष में भी कभी
पतझड़ तो हुआ होगा!
*

जड़ों से जोर आजमा कर
पौधा, पेड़ कैसे बन सकता है?
लाशें बिछाकर मिला सिंहासन
अलाव सा तपा हुआ होगा!
*
वृक्ष हो तो बटवृक्ष सा
मूल-तने में भेद ना हो
देखकर ना दिखे सहारा
किसका कौन हुआ होगा!
*
पेड़ खड़े हैं जंगल जंगल
एक दूजे के साथ सदा
छोटों को मार जंगल में कब
बड़ा कोई पेड़ हुआ होगा!
*
आओ थोड़ा जड़ से जुड़ लें
जंगल से जीना सीखें जरा
बढ़ते चलें सब और हम भी
आगाज यूँ ही तो हुआ होगा!
*
सूखे पत्तों का हश्र युगों से
एक जैसा ही हुआ होगा।
कल्पवृक्ष में भी कभी
पतझड़ तो हुआ होगा!

-सत्यार्चन सुबुद्ध 

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