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जाने मैं जानूं… कि तुम जानो…

जाने मैं जानूं… कि तुम जानो…

तुम्हारा खत मिला ….
पढ़कर आश्चर्य हुआ कि जीने का एक तरीका यह भी हो सकता है…

मुझे तो लगता है कि इंसान सोशल एनिमल है….

अकेले तो वो जी ही नहीं सकता…

साथ चाहिये होता है…

और साथ के लिये सामंजस्य पहली शर्त है…

सामंजस्य बिना त्याग के कैसे संभव है

फिर कैसे?

हाँ में हाँ मिलाने वाले मित्र नहीं हो सकते…

वे वेतन भोगी कर्मचारी भी नहीं जो आपसे वेतन पाते हैं

ना वे जो केवल धन या तन पाने की आस में हैं

ना ही उपकृत या खरीदे हुए लोग ही साथी या दोस्त हो सकते….

दोस्त के मायने दोस्त शब्द जैसे ही तो हैं…

एक और एक मिलकर दो …

दो में से दोनों आधे-आधे अस्त हों तब दोस्त….

दोनों का अलग अलग अस्तित्व अस्त होकर बचे शेष से मिलकर बना, दो का एक होकर उदित होना

तब सशक्त दोस्ती बनती है …

हर तरह के ही संबंध के बने रहने में दोस्ती आवश्यक है…

चाहे वह किसी का भी किसी से भी कैसा भी संबंध हो…

दोस्ती ही संबंध का मूल अवयव है…

दोस्ती का मूल अवयव दूसरे के साथ जुड़ने में स्व का अस्त होना है…
शायद नादानी हो मेरी …

मगर मेरे लिये, मेरे अपने / अपनों के बिना मेरा होना, संभव ही नहीं…

यह जरूर है कि अपने, हर एक के लिये अलग-अलग तरह होते हैं …

किसी के लिये केवल रक्त-संबंधी, किसी के लिये प्रेम संबंधी भी, तो किसी के लिए इन दोनों के साथ-साथ मित्र-संबंधी भी….!

अपने कैसे भी हों…

उनका आपसी संबंध, बिना आपसी व्यवहार के ,

यानी बिना आपसी लेनदेन के…, मधुर तो नहीं रह सकता …

फिर लेनदेन भले भौतिक हो या मात्र वैचारिक ही ….

वैसे तो भौतिक और वैचारिक दोनों ही तरह के लेनदेन को मिलाकर ही संबंध निभते हैं…

सिर्फ लेन से नहीं और सिर्फ देन से भी नहीं…

सिर्फ लेन या सिर्फ देन, एक तरफा प्रेम है… या दोहन है… या शोषण है!

एक तरफा प्रेम, दोहन या शोषण में सुखांत तो संभव है ही नहीं…

खुद से, रब से और सबसे.. प्रेम भी बिल्कुल वैसा ही है…

नितांत एकमार्गी….

केवल मन बहलाव….

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