कुर्बानी- नेकी के लिए!

अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…! जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें!

सभी मजहबों/ धर्मों की किताबों में लिखे वाकये (घटनाएं) वो नजी़रें हैं जिनको वक्ती हालात के हिसाब से आज, और आज से 1000 साल बाद भी, अमल में लाया जाना मुनासिब है और रहेगा …

इस्लामिक आस्था से जुड़ी, “कुर्बानी” भी एक ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है!

इस्लाम में कुर्बानी की शुरुआत का जिक्र, सर्वोपरि “हुजूर” के दरबार में उनके नबियों (फालोअर्स) के बीच सबसे काबिल होने / “हुज़ूर” के सबसे अजीज ओ करीब होने के दावे पर बहस चल रही थी! उन काबिलियत का दम भरने वालों की मौजूदगी में ही “हुजूर” ने एक उचित को चुनकर उनकी वफादारी साबित करने उन्हें एक इम्तेहान से गुजरने का मौका दिया! जिसके लिए उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने का हुक्म दिया गया…. बाकी नबियों ने गर्दनें झुका लीं मगर वे नबी पिता अपने बेटे की कुर्बानी देने, और उनके बेटे कुर्बान होने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गये!
हुजूर के दरबार में घटी इस घटना के दृश्य में पिता की आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की तलवार से कुर्बानी दी जाना और कुर्बानी के बाद पट्टी खुलने पर बेटे की जगह गर्दन कटे हुए बकरे का देखा जाना, बताया गया है!

इस बेहतरीन वाकये में एक से अधिक सीखें समाहित हैं…

1- तुम्हारे खैरख्वाहों /सरपरस्तों को जानो! उनके हुक्मों की, बिना किसी शक-ओ-शुबहा के बस तामील करो…! “
“जिनमें खैरख्वाही दिखती हो उनमें शुबहे कैसे देखे जा सकते हैं?”

2- अगर तुम सच्चे हो, ईमान पर हो और कभी भी, कहीं भी तुम्हें तुम्हारी सच्चाई का इम्तेहान देने कहा जाये, तो बड़े से बड़े इम्तिहान से गुजरकर दिखा दो कि तुम सच्चे हो!

3- नेकी की राह पर चलकर ही कबूल होने लायक इबादत की जा सकती है… नेकी की राह बेहिसाब कुर्बानियां चाहती है… इसीलिए नेकी के लिए कोई भी कुर्बानी छोटी है…!

रमजान में ईद-उल-फितर पर खूब जलसे किये फिर कुर्बानी मांगने वाली “ईद-उल-जुहा” आ रही है ! तो क्या हुजूर की नजरों में खुद को साबित नहीं करशा चाहोगे? क्यों! अब से हर “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम, नेकी के लिए, अपने आपकी कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! आज के हालातों में रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी से अच्छी और बड़ी कुर्बानी और क्या होगी? दीजिए…! रक्त बहाने के लिए नहीं… सहेजने के लिए हो…. आपकी कुर्बानी…. किसी की जान लेने नहीं ज़िन्दगी देने के लिए हो आपकी कुर्बानी…!

जरूरी होने पर जब औरों से आंखें, लीवर, किडनी, ब्लड, बांह, मांस, होंठ आदि लिए जाने में मज़हब आड़े नहीं आता है…. तो इत्मीनान रखिये… इनके दिये जाने में भी मज़हबी बंदिशें नहीं हो सकतीं!

चाहें तो अपने हाफ़िज़/ मौलवी/ मौलाना साहिबों से मशविरा करें… और अगर जायज़ पायें तो आगे बढ़ जायें… दीन के काम आकर मुस्लिम समुदाय को इज्जत बख्शने की वजह बन जायें!

जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी

इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें! इस्लाम का रुतबा ऊंचा बनाए रखने, ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम, अपनी जाती कुर्बानी देकर सच्चा मुसलमां होकर दिखायें!

सबसे अच्छी वो कुर्बानी, जो दे किसी को जिंदगानी!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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