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जीवन दर्शन 

जीवन दर्शन 
अपने जीवन में पीछे की ओर जाइये•••

घटित को ईमानदारी से देखिये! 

अपने सद्कर्म और असद्कर्म! 

प्राप्तियाँ और लुप्तियाँ!

सहयोग और असहयोग! 

आशीष और श्राप! 

सराहना और कोसना! 

सभी कुछ•••

जैसा जैसा बीज हम बोते जाते हैं कुछ ही समय बाद वैसी- वैसेी फसल आनी शुरु हो जाती है 

सत और असत में से जिस तरह के बीज की फसल की जितने मन से जितनी गहन देखभाल की जाती है वह उतनी ही लहलहा कर आती हैं! और जिस फसल को वेमन के पानी से सींचो वह उतनी ही दुर्बल होनी ही है!

यही तो प्रकृति है !

यही (स्वनिर्मित) प्रारब्ध!
-सत्यार्चन  

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अच्छा-बुरा... कुछ तो कहिये...

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