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ज्ञान_ध्यान 

ज्ञान_ध्यान-2

वचनबद्ध, सत्यनिष्ठ और सतपथिक का अनुभव बताता हूँ! 

ऐसा मनुष्य आजीवन अस्वीकार की पीड़ा झेलता है•••• 

यह अलग बात है कि

यह पीड़ा उसे आनन्ददायिनी होती है,

 उसका सुव्यसन बन जाती है! 

इसपर चलकर ही ब्रम्हानंद की प्राप्ति होती है! 

किन्तु संसार के अधिकांश लोगों की दृष्टि में 

यह मूर्खता है! 

सत्पथिक को भ्रमित संसारियों

के भ्रम की परवाह भी नहीं होती! 

सत्पथिक का उचित संसारियों को अनुचित लगता है! 

सत्पथिक अनुचित से परे होता है! 

संसारी सत्य का पुजारी होकर ही सुखी होना चाहता है 

किन्तु सत्य के अनुसरण का साहस नहीं जुटा पाता

 ना वह सत्यानुसरण को उचित मानता है!

बल्कि संसारी अपने असत अनुगमन को 

सर्वथा उचित मानने हैं 

और सतकामी अपने सत्यानुसरण को!

अपने अपने संचित कर्म जनित 

अपना अपना अनुभव है

और अपना अपना अभिमत!

हरि ऊँ!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

 

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