तुम फिर••• 

तुम फिर•••

फिर आ गये हो

तुम 

जगाने आस

गहराने प्यास

हर बार की तरह

करने निराश!

तुम ना आते

तो भी जी जाते

दर्द पीते आये हैं

पी जाते!

मगर शायद तुम्हें नहीं

इसने भर से संतोष

है अनंत…

तुम्हारा आक्रोश

तुम चाहते तो हो मुझे

सूली पर चढ़ाना

मगर सहलाते भी हो

बार बार

फिर हंटर उठाते हो

उधेड़ डालते हो मुझे

निढाल हो गिर पड़ने तक

फिर से उठाते हो

बिठाते हो

मरहम लगाते हो

और

फिर-फिर गिराते हो!

क्यों करते हो?

क्या चाहते हो?

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

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