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नव विहान! 

ऎ दिल

काश ! कोई होता—

जिस से ,
मैं भी कह लेता
दर्द अपने —
तो जी लेता !

भीड़ में अकेले
यूँ ही जीते हुए
अपने अश्क आप ही
पीते हुए
तो जिया नहीं जाता ना !

संघर्ष जीवन का
करते सभी हैं
प्रयासों में घायल
होते सभी हैं
पर अपने जख्म आप ही
सहलाते हुए
दर्द में अपने आपको
बहलाते हुए
कोई कब तक जिये ?
क्यों कर जिये?

ऐ दिल !
पागल!
पन्ख पसार अपने
उड़ान भर
मनचाहे नीड़ के मिलने तक
या अपनी सांसो के थमने तक
लम्बी ऊँची उड़ान भर——
जा भुला दे
जो पीछे छूट गया
अन्धेरी रात का दुःस्वप्न
जो टूट गया

प्रतीक्षित होगा
कहीं तो कोई
तेरे लिए  !
कहीं तो
कभी तो
होगा

नवविहान!

#सत्यार्चन

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4 thoughts on “नव विहान! ”

    1. सत्यार्चन.SathyArchan कहते हैं:

      धन्यवाद्
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      हमारा, लेखन हिन्दुस्तानी के वर्तमान और भावी सदस्यों का!!!!!!
      – सत्यार्चन

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