परिष्कृत प्रारब्ध क्या है?

प्रारब्ध या नियति पर बहस व्यर्थ की बहस है…
आपकी पारिस्थितिकी
(आपका देश, काल और परिस्थिति) आपके नियति निर्धारक नहीं है किन्तु आपकी नियति का छद्म किन्तु दृढ़ घेरा अवश्य बनते हैं…

उत्कृष्टता आकांक्षितों को अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य से इस घेरे को तोड़ बाहर निकलना होता है…. तब अगले बड़े होते जाते घेरे आसानी से टूटते जाते हैं…. प्रारब्ध परिष्कृत हो पक्षकर बनता जाता है….

और व्यक्ति मनवांछित उत्कृष्टता को पा लेता है या निकट तक पहुंच जाता है…

अन्यथा अन्य पशुओं की तरह ही सामान्य व्यक्ति, सामान्यतः माता पिता के समान जन्म, पोषण, प्रणय, संतोनोत्पत्ति और मरण के पहले घेरे में ही सीमित रह खुशी-खुशी जीवन जीकर परलोक गमन कर जाता है!

पहले घेरे में सीमित रह पशुवत जीने वाले या संघर्ष कर अनेक घेरों को तोड़ उत्कृष्टता तक पहुंचने वालों में से कोई भी श्रेष्ठ या निम्न नहीं हो सकता….

प्रश्न पथचयन का है… मनचाहे पथ के पथिक हो निरंतर चलते रहें… अपनी जीवन यात्रा, अपनी इच्छानुसार संपन्न करें… ना पथभ्रमित हों ना पथभ्रष्ट…
हरि ओम्!

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

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