बुद्धिहीन तनु जानिकै….


“बुद्धिहीन तनु जानिकै सुमिरों पवन कुमार…
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार!”

“अर्थात हे प्रभु मेरे भीतर बसे क्लेशों के कारक विकारों को दूर करने, औषध सवरूप मुझे;  बल, बुद्धि और विद्या प्रदान कीजिए!”

तो ले लीजिए ना आपके माता-पिता, गुरु- सज्जन, बंधु-बांधव, मित्र-सहपाठी, संगी-साथी, सहयात्री-सहचर अनेक रूपों में, समय समय पर विराजमान होकर प्रभु आपके पास आकर अनेक अवसरों पर अनेक प्रकार से आपका शुभ करना चाहते हैं••• आपको देना चाहते हैं!

*यही बात गोस्वामी तुलसीदास जी ने अनेक तरह समझाने का प्रयास किया है…..!
*”तुलसी या संसार में सबसे मिलिये धाय! ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाये…..!”*

*”जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!*

*जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलत ना कछु संदेहू”*
(जिसमें आपकी अनुरक्ति होगी वही आपके मानस पटल पर सदैव उस्थित रहेगा और उसकी प्राप्ति भी होगी ही होगी! शुभ का चिन्तन है तो शुभ और अशुभ का है तो अशुभ!)
हनुमान जी भी तो देना चाहते हैं… ….किन्तु आप…. लेना भी तभी चाहते हैं जब; दारासिंह जी ही, हनुमान जी के गेटअप में पूरा मेकअप करके आपके बीच उपस्थित हो आपके शीष पर आशीष का हाथ रख दें!

…  और आप आपकी अकर्मण्यता व अज्ञानता को अक्षुण्ण रखते हुए कृतार्थ होने का अनुभव लें साथ ही अपने मित्रों परिचितों में आपको प्राप्त हुई कृपा का वर्णन कर कर के लोगों से कृपा पा लें…

होता भी यही है…

अगर आप एकाध प्रमाण अटैच कर सके तो फिर तो आपके लिए आपका ढोंग ही, विलासिता सहित, सम्पूर्ण साधन आजीवन  जुटाने का कारण बन जायेगा•••

फिर अकर्मण्यता के परित्याग के विचार की भी आवश्यकता ही क्या है! ऐसी अज्ञानता भी तो कितनी सुखकर है…. कौन ऐसे ज्ञान को पाने का प्रयत्न करना चाहेगा… जिसका मार्ग कष्ट पूर्ण तथा अंत भी कष्टरहित है या नहीं पता ही नहीं?कौन करना चाहेगा?
   इसीलिए ज्ञान-व्यान छोड़िए! आडम्बर का अनुसरण ही अधिक सुखकर है… ऐसा ही तो होते आया है….  हो भी रहा है… इसीलिए हर कोई… 33सों में से किसी ना किसी आदर्श के (या उनके दायें-बायें हाथ के) गेटअप में चमत्कारी भगवान बनकर, कृपा प्राप्ति के प्रमाण साथ लिये यहां वहां प्रदर्शित करते घूम रहे हैं!

…… हवा में से प्रसाद, ताबीज, पत्थर, प्रतिमा निकाल कर दिखाने वाले बाजीगरों के कदमों में मंत्री, संतरी, राजे, महाराजे बिछते भी आये हैं और मिटते भी…. उनका दृढ़ विश्वास होता है कि
जो मिला बाबा जी की कृपा से…
जो मिट गया वह राजा जी की गलती से…( सलाह दोनों में बाबा जी की…)
दोनों के ही करने वाले राजा जी….
सभी जीतें बाबाजी की कृपावश(?)
सभी हारें राजा की मूर्खता से…(?)
और इस तरह
बाबाजी जिंदाबाद थे !
बाबाजी जिंदाबाद हैं!!
और
बाबाजी जिंदाबाद…..
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रहेंगे ही रहेंगे…!

क्योंकि बल-बुधि-विद्या मांगते मांगते बर्षों बीतने पर जब प्रसन्न हो ‘वो’ देने तत्पर हो भी जाते हैं तो पहले वाले की पहली किश्त मिलते ही तुम… बौरा जाते हो…
ऐसे बौरा जाते हो….
भूल ही जाते हो कि बल की भी यह पहली/ दूसरी ही किश्त है जो मिली …. अभी तो बल की तक प्राप्ति पूरी नहीं हुई…
बुद्धि तो शेष है ही…
इन दोनों कृपाओं के उपयोग की विद्या भी
जिसके बिना ये दोनों ही कलायें घातक होने वाली हैं!

(शनिवार 04042020)

-सुबुद्ध सत्यार्चन

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लेखक: Charchit Chittransh

"SwaSaSan" में तीन हिन्दी शब्दों 1-स्वप्न या स्वतंत्रता 2- साकार 3 संकल्प या संघ के प्रथमांशों का समावेश है... कुछ और कहना शायद. अनावश्यक ही होगा .....???