भारतीय पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में मूल्य चेतना की आवश्यकता

भारतीय पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में मूल्य चेतना की आवश्यकता

भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप परिवार की अवधारणा की पूर्ति कर सकने में सक्षम परिवारों का समाज में परिलक्षित भी हो पाना दुर्लभ हो गया है. इस सांस्कृतिक पतन के कारण मिल सकें तो शायद भारत का सांस्कृतिक पुनरोत्थान भी विचारणीय हो सकता है!

भारतीय संस्कृति सदैव शुभ की सहचरी हुआ करती थी, किन्तु राज घरानों की विलास प्रियता से राज शक्ति पतित हो पंगु हुई, फिर बाहरी शक्तियों के हाथों सत्ता आने पर संस्कृति का संरक्षित रहना संभव नहीं रहा… ! मुगलकाल की अपेक्षा पश्चिमी आक्रांताओं के शासन-काल में ही संस्कृति अधिक आहत हुई. मुगलकाल में संस्कृत और फारसी भाषीय विषमता के बाद भी दोनों के विकास क्रम की उपज हिन्दी एवं उर्दू भाषाओं का साहचर्य रहा ! जबकि अंग्रेज पूर्ण विपरीत सांस्कृतिक मूल्यों के वाहक बने.

अंग्रेजों के छल-बल से परिपूर्ण शासन काल में, जनसामान्य अनैतिक के विरोध में अक्षम था इसीलिए विवश हो एन-केन-प्रकारेण अंग्रेजों का कृपा पात्र होने में ही हित देखने लगा और धीरे-धीरे अंग्रेज आक्रांता होते हुए भी भारतीय जनमानस का आदर्श बन बैठा. यह भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक क्षति थी! तब सरकारी नौकरी पाने अंग्रेजी को और अंग्रेजों की समकक्षता पाने अंग्रेजियत को अपनाना आवश्यकता बनी, जिसने अंग्रेजियत को ओढ़े इन भारतीयों, यानी ‘भारतीय अंग्रेजों’ को आर्थिक और सामाजिक सुदृढ़ता भी प्रदान की. धीरे-धीरे ‘भारतीय अंग्रेज’ होना जनसामान्य का सपना बनता गया!

महात्मा गांधी ने इस सांस्कृतिक ह्रास को समझा, इसकी पुनर्प्राप्ति को आवश्यक माना और आजीवन इस दिशा में प्रयासरत रहे! दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत के अधिकांश राजनेता भी ‘भारतीय अंग्रेज’ ही हुए! बापू मार्गदर्शन के लिए रहे नहीं और वर्तमान का सक्षम भारतीय भी पराधीनता की देन ‘अंग्रेजियत’ को शान से अंगीकृत किए है. अंग्रेजी की भाषीय समृद्धि निर्विवाद है किन्तु भारतीय समाज में विकसित कहलाने के लिए, स्वदेश में भी रोजगार पाने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान आवश्यक माना जाता है. जिसके कारण अंग्रेजी के साथ-साथ अंग्रेजी तौर-तरीकों को भी अपनाया जा रहा है, यह दुर्भाग्य-पूर्ण है. उससे भी अधिक दुर्भाग्य-पूर्ण स्वातंत्रोपरांत अंग्रेजी का शासकीय निरंगीकरण ना हो पाना है.

भारत विविधताओं से परिपूर्ण देश है, देश के विभिन्न हिस्सों में 14 मान्यता प्राप्त भाषायें प्रचलित हैं, सबसे बड़े हिस्से में हिन्दी बोली जाती है, इसीलिए अहिन्दी भाषा-भाषी स्वदेशी रोजगारोन्मुख हिन्दी को जानने में वरियता देने लगे हैं किन्तु हिन्दी भाषी राज्यों में रोजगार-रत रहते हुए भी वे अपनी पैतृक भाषीय एवं सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने में सक्षम हैं! शायद इसलिए कि उनका हिन्दी समझना और समझने योग्य बोल पाना ही पर्याप्त है. हिन्दी जानना उसकी आवश्यकता है किन्तु हिन्दी का, हिन्दी भाषीय संस्कृति का अंगीकरण अनावश्यक! बस यही अंग्रेजी के या किसी भी अन्य भाषा के प्रति होना चाहिए था! किन्तु पराधीनता के समय से ही अंग्रेजों की कृपा पाने उनसे अपनी निकटता का प्रदर्शन करने की होड़ में उनकी संस्कृति को जो जितना अधिक अपना सका वह उतना प्रतिष्ठित माना जाने लगा, जो अंग्रेजियत के स्तरीय प्रदर्शन में अक्षम हुआ वह उपहास का पात्र बनता रहा और आज अंग्रेजियत हमारी विरासत की तरह हमारे साथ है. ना केवल सामाजिक वरन् राजनैतिक विरासत के रूप में भी!!!

वर्तमान सामाजिक परिदृश्य वर्णसंकर संस्कृति का परिचायक है. सामाजिक गुणसूत्र ही परिवर्धित हो चुके हैं. वर्णसंकर से पुनः कुलीनता की प्राप्ति की ही तरह भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना दुष्कर एवं दीर्घकालीन लक्ष्य है. किन्तु प्रारंभ अविलम्ब आवश्यक है! विशेषकर तब तो अवश्य जब हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग योग, ध्यान, शाकाहार, सदाचार, सत भाषण आदि के अनुसरण को वे विकसित राष्ट्रवासी उन्मुख हैं जिनका अनुसरण हम सांस्कृतिक समृद्ध भारतीय, अकारण ही, सैकड़ों साल से, करते चले आ रहे हैं! आवश्यकता है राजनैतिक एवं प्रशासकीय इच्छा-शक्ति की, योजनाकारों की और अनुपालन सुनिश्चित कराने की! ताकि हम फिर से अग्रगामी हो सकें !

संस्कृति की पुनर्स्थापना में सर्वाधिक बाधक स्वयं शासन तंत्र ही रहा है. यदि बाधक ही साधक होने तत्पर हो तो आधा मार्ग तो पार हो ही चुका है. सर्वप्रथम प्रशासकीय भाषा को अंग्रेजी से स्थानीय भाषाओं में बदला जाना चाहिए, फिर हमारी आवश्यकता की प्रति पूर्ति में सक्षम ‘निजी शिक्षा-पद्धति’ विचारणीय हो. वर्तमान रहवासी विद्यालय, हमारे प्राचीन गुरुकुलों की पद्धति के प्रतिरूप होकर अनुकरणीय नहीं हैं क्या? जहां, राजघरानों के कुल-दीपक भी न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं के साथ, जीवन की विषमताओं से परिचित होते हुए, शिक्षा ग्रहण किया करते थे! शिक्षण के क्षेत्र में शिक्षक-शिक्षार्थी संबंधों की नैतिकता भी विचारणीय है! प्रतिष्ठित विद्यालयों में प्राचार्य या आचार्य के आचरण पर विद्यार्थी या उनके पालक उचित अनुचित का प्रश्न उठाने का विचार तक नहीं करते किन्तु शासकीय विद्यालयों के आचार्यों के शिक्षण के लिए आवश्यक दी गई छोटी मोटी प्रताड़ना पर अनैतिकता के आरोप लगाया जाना आम है! सीधी सी बात है गुणवत्ता की प्राप्ति हेतु अनैतिकता से समझौता किया जाता है! किया जा रहा है, कारण है अन्यत्र अपेक्षित गुणवत्ता का ना मिल पाना ! आवश्यकता है स्तरीय स्थानीय सांस्कृतिक विद्यालयों के निर्माण, संरक्षण, विकास एवं संवर्धन की दिशा में एक दीर्घकालीन कार्यक्रम की.

भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संदर्भ में प्राचीन काल से लेकर 500 वर्ष पूर्व तक का आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक भारत अवश्य विचारणीय होना चाहिए जो विश्व को अपनी समृध्दि से रिझाता था, जो सर्वाधिक समृध्द भारत था. जब स्त्री ममता, माधुर्य और शक्ति रूपा हुआ करती थी. वह माँ के रूप में सफल गृह प्रबंधक थी, पत्नी/ प्रेयसी के रूप में सक्षम सलाहकार, प्रेरक और सहयोगी थी. साथ ही आवश्यकता पड़ने पर कुशल शासक भी और योद्धा भी. वह सर्वथा आदरणीय थी. वंदनीय थी. क्योंकि तब तक स्त्री-पुरुष परस्पर प्राकृतिक पूरक थे… प्रतिद्वंद्वी नहीं! भारतीय संस्कृति में स्त्री को अर्धांगिनी माना गया है. स्पष्ट है कि स्त्री और पुरुष दोनों अपूर्ण हैं! पृथक-पृथक दोनों आधे किन्तु दोनों मिलकर पूर्ण! स्त्री और पुरुष दोनों अपनी-अपनी प्राकृतिक विशेषताओं और न्यूनताओं को नकार नहीं सकते. ना नकारा जाना चाहिए. मुगलकाल की सबसे बड़ी सांस्कृतिक क्षति स्त्री को शक्ति के स्थान पर उपभोग की वस्तु के रूप में वर्गीकृत किया जाना रहा है. अन्यथा स्त्री जो पुरुष की अपेक्षा प्राकृतिक रूप से अधिक विशिष्ट है उसे वैशिष्ट्य से कमतर समानता ना मांगना पड़ती! हालाकि स्त्री का वस्तु रूप में प्राचीनतम प्रयोग रामायण तथा महाभारत काल में भी सीता-हरण और द्रोपदी के दांव पर लगाये जाने के रूप में मिलता है किन्तु निंदनीय कृत्य के रूप में ही.

प्राकृतिक रूप से स्त्री पुरुष की तुलना में केवल बल में दूसरे स्तर पर है किन्तु सकल नैसर्गिक गुणों के साथ पुरुष से कई गुना शक्तिशाली! यही कारण रहा होगा कि भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा में स्त्री ने स्वयं के लिए गृह प्रबंध का क्षेत्र चुना होगा! भारतीय संस्कृति में स्त्री को आदर-सम्मान पाने केवल स्त्री होना ही पर्याप्त था, उसका या उसके परिजन का पद विचारणीय नहीं था. शायद इसीलिए स्त्री सफल गृहिणी होकर सर्वदा गौरवान्वित होती रही! जब तक स्त्री मूलतः गृहिणी के दायित्व का निर्वहन करती रही तभी तक परिवार सशक्त थे. जब कुलगत संस्कारों (सुप्रथाओं और कुप्रथाओं) की संवाहक स्त्री ही थी.

पुरातन काल में स्त्री ही उचित पुरुष का वर के रूप में चुनाव स्व-विवेकानुसार करती थी, पालक भी सहर्ष उसके निर्णीत वर को मान सहित उपहार देकर स्वीकारते थे. कालांतर में यही उपहार दहेज कहलाये फिर ‘दहेज दानव’ भी! क्योंकि उपहार में क्या दिया जाये इसका निर्णय देने वाले के स्थान पर नाकारा युवकों के नपुंसक और भिक्षुक परिजन करने लगे. यहाँ से ही स्त्री का सम्मान आहत होना शुरु हुआ. यहीं से स्त्री-पुरुष के बीच की दुर्भाग्यशाली दीवार खड़ी होनी शुरु हुई.

आज भारतीय स्त्रियों को भी काम काजी होना पड़ रहा है जिसका सर्वाधिक प्रभाव अगली पीढ़ी के उचित लालन-पालन पर पड़ रहा है. इस त्रुटि के दूरगामी परिणाम, विकसित देशों की ही तरह, भावी पीढ़ी के सांस्कारिक विनाश के रूप में परिलक्षित होंगे. जैसे कि विकसित देशों में किशोरों की विकृत / अवसाद ग्रस्त कुंठा का प्रदर्शन आये दिन, अकारण सार्वजनिक हिंसात्मक प्रतिक्रिया के रूप में, मीडिया की सुर्खियां बन रहा है. वहां शासन की समस्या अविवाहित किशोरी माँओं का पुनर्वास है फिर भी कम से कमतर उम्र की मां बनने का नित नया कीर्तिमान बन रहा है. कारण है आर्थिक विकास को सर्वोपरि मान, आर्थिक लक्ष्य को पाने स्त्री-शक्ति का नैसर्गिक क्षमता के विरुद्ध, शोषण की सीमा तक, घर और बाहर दोहरा प्रयोग होना, जिससे वहां परिवार, पड़ौस और समाज, शब्द मात्र रह गये, संवेदनात्मक शेष नहीं रहे. अभी हाल ही में अमेरिकी सेना में महिलाओं की भर्ती का उद्देश्य पुरुष सैन्य कार्मिकों को यौनोद्माद जनित मनोरोगों से बचाना बताया है… क्या हमें भी करना चाहिये? फिर भी हम भारतीय उनके अंधानुकरण को ही हितकर मान रहे हैं!

सामाजिक उत्थान प्रशासनिक दायित्व है जिसकी प्रति पूर्ति के लिए प्रशासन को बड़े साहसिक और क्रांतिकारी कदम उठाने की आवश्यकता है! दहेज कुप्रथा, यौन शोषण, भ्रूण हत्या जैसे दानवीय कृत्यों के निराकरण के कड़े कानूनों के साथ-साथ उनका सटीक अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, इस कानून का दुरुपयोग करने बालों पर भी समान कार्यवाही सुनिश्चित की जानी चाहिए. स्त्रियों के अनुरूप रोजगार के क्षेत्रों को चिह्नित किया जाना और उनमें स्त्रियों की भागीदारी और पुरुषोचित क्षेत्रों में पुरुषों को ही रोजगार सुनिश्चित किए जाने चाहिए.

यदि हमारे लिए हमारी संस्कृति का कोई मूल्य शेष है तो वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर सांस्कृतिक मूल्यों से पुनः परिचय इनका अनुसरण, अनुगमन, विचार और प्रचार आवश्यक है!

“सुबुद्ध सत्यार्चन”

(मूल नाम- वीरेंन्द्र कु. म.मोहन खरे)

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भोपा

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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