भ्रमित संस्कार

मैंने कहा “एक ही बिल्डिंग में तो चलना है… चलो एक ही टैक्सी में साथ चलते हैं… अपनी तनहाई पर… पाकेट पर.. और कुदरत पर… थोड़ी मेहरबानी करते हैं”….
जबाव आया ” “चलते… पैसा भी बचता…. पर आप स्मोक करे बिना तो रहोगे नहीं…. खिड़की खोलेंगे भी, तो भी गंध सतायेगी और ठंड भी… बाद में घर पर मिलते हैं…”
अपनी अपनी टैक्यी पकड़ चल पड़े हम !
मैं रास्ते भर सोचता रहा कि पहले के समय में समझौतों में जीने के संस्कार मिलते थे तब सब संभव हो जाता था…. आज के (स्व+)अभिमानी युग में ना तो स्मोक की बदबू फैलने से रोकी जा सक रही और ना ही इसने बदबू सहने की क्षमता ही शेष छोड़ी !
हर किसी को अपना अधिकार चाहिये… क्योंकि स्व ही सर्वस्व हो गया…. तो कर्तवय-निर्वहन तो पहले ही निःशेष हो चुका ना!!!!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan