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मेरा हृदय, घर है तुम्हारा



मेरा हृदय, घर है तुम्हारा

 

 

मेरे हृदय का एक कक्ष …
आरक्षित रहा जो  तुम्हारे नाम…
ना भर सका तुम्हारे सानिध्य से ….
ना ही रिक्त तुम्हारी यादों से….,

 

तुम हो अब ‘स्थित वहाँ ‘

 

यहाँ मगर मेरे दिल में भी हो

और रहोगी भी सदा ….

तुम्हारी अमिट यादों  में….!!!

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8 thoughts on “मेरा हृदय, घर है तुम्हारा”

  1. Raja Dewangan कहते हैं:

    वाह सर मज़ा आ गया बहुत ही अच्छा लिखा है आपने 👌👌👌👌

    1. सत्यार्चन.SathyArchan कहते हैं:

      धन्यवाद् …. आप पारखी हैं …

    1. सत्यार्चन.SathyArchan कहते हैं:

      धन्यवाद मित्र … प्रेम एक विशिष्ट अनुभूति है…. हर कोई इससे गुजरता है… अपना-अपना तरीका भी …

अच्छा-बुरा... कुछ तो कहिये...

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