मेरा हृदय, घर है तुम्हारा

मेरा हृदय, घर है तुम्हारा

 

 

मेरे हृदय का एक कक्ष …
आरक्षित रहा जो  तुम्हारे नाम…
ना भर सका तुम्हारे सानिध्य से ….
ना ही रिक्त तुम्हारी यादों से….,

 

तुम हो अब ‘स्थित वहाँ ‘

 

यहाँ मगर मेरे दिल में भी हो

और रहोगी भी सदा ….

तुम्हारी अमिट यादों  में….!!!

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

“मेरा हृदय, घर है तुम्हारा” पर 8 विचार

अच्छा-बुरा... कुछ तो कहिये...