मेरी अपनी नजर से जो देखा मैंने अपना नजरिया•••

मेरी अपनी नजर से जो देखा मैंने अपना नजरिया•••

कभी कभी सभी, अपने आपसे भी बातें करते हैं••• किन्तु मैं अकसर अपने आपसे ही बातें करता हूँ••• क्योंकि अपनों को बात करना नहीं भाता •••• और गैरों से बात करना मुझे नहीं सुहाता••••! कल ही किसी का भेजा वीडियो खोला तो “मीत ना मिला रे मन का” ओरीजनल वीडियो था! तो बातचीत शुरू हो गई••• अपने आप से••••
कितना प्रसिद्ध रोमांटिक  गाना है मगर मैं तो भूल ही चुका था कि अमिताभ बच्चन जी पर फिल्माया गया है!
कमाल है!

अमिताभ बच्चन तो  एक एक्सन हीरो थे••• उनपर ये रोमांटिक गाना भी फिल्माया गया है? वैसे उनपर ज्यादा जंचता भी नहीं है! वो तो कुली, जंजीर, देशप्रेमी के विजय वाले रोल में ही अच्छे लगते हैं!
उनपर रोमान्टिज्म कहाँ सूट करता है ••• या तो वो फिलाॅसफी या एक्सन करते ही अच्छे लगते हैं! ••• यही उनसे उनके फिल्म निर्माताओं ने कराया भी••• तभी तो एंग्री यंग मेन इमेज में वो इतने फेमस हुए •••! उनकी सूरत शक्ल  कदकाठी पर रोमांटिज्म अजीब सा ही लगता••• इसीलिए उन्हें रोमांटिक फिल्में ना तो मिली और ना वो उनमें सफल हुए•••• “ये मीत ना मिला रे मन का” भी एक शायर का रोल निभाते हुए है शायद••• रोमांटिक  कहाँ है? 
अमिताभ जी की शुरुआती असफलताओं का कारण भी यही लगता है••• बाद के  महानायक शुरुआती फ्लाॅप!   शुरू शुरू में रोमांटिक फिल्में ही तो मिली थीं उनको फ्लाॅप रहे•••• फिर एक्शन फिल्में मिलीं तो कहाँ से कहाँ पहुँच गये वो••• मैंने तो उनकी लगभग सारी ही फिल्में देखी हैं•••  और कौनसे रोमांटिक रोल किये हैं उनने?
  शुरु-शुरू कौनसी फिल्में आई थीं उनकी? ‘सौदागर’, ‘बाम्बे टू गोआ’, ‘बाबर्ची’ ‘मजबूर’, ‘आनंद’, ‘गुड्डी’, सत्ते पे सत्ता, फिर आईं “जंजीर” “शोले” वगैरह•••• पर “अभिमान”, “मिली”, ‘त्रिशूल’, “मुकद्दर का सिकंदर”, “सिलसिला”, “कभी कभी”, “बागवां” भी तो उन्हीं की थीं••• सभी नामी गिरामी और सभी रोमांटिक फिल्में!

मेरे खयालों का कारवाँ आगे बढ़ रहा था आवारगी के साथ••• जैसा अकसर होता है अपने आप से बातें करते हुए•••

अमिताभ जी की अभिमान से सिलसिला तक सभी में एक खास तरह का रोमांटिज्म तो था! शोले का वीरू साइलेंट लवर था तो मुकद्दर का सिकंदर का उग्र और मुखर••• उसमें उनका डायलाग “जोरा दरवाजा खोल••• दिलजला हूँ दुनियां को जला के राख कर दूंगा” तब के जवां दिलों को झकझोरने वाला था•••

शायद हम लोग ही भुला देते हैं किसी शख्स की शख्सियत के सुहाने रंग••• बदनुमा दाग तो कितने भी पुराने हों यादों में ताजा बने रहते हैं•••• हम वही मान बैठते हैं किसी कलाकार को जो उसके निर्देशक अभी हाल के दिनों में उसे दिखा रहे हैं!

इसी तरह तो हम हर किसी शख्स को भी देखते हैं जैसा हमारे दोस्तों नजरिया कहता हो••• हम सभी में; दूसरों के नजरिए का रंगीन चश्मा हटाकर, सीधे-सीधे अपनी नजर से, साफ साफ देखने की काबिलियत तो है! मगर अकसर हम अपनी इस काबिलियत को भुलाये रखते हैं••• और जिंदगी में ज्यादातर चीजें रंगीन नजरिए वाले चश्मे से ही देखते चले जाते हैं••• कई बार तो कई बेशकीमते हीरों सी शख्सियतें हमारे करीब से दूर बहुत दूर चली जाती हैं••• और शख्सियतें ही क्यों••• कितने ही रास्ते••• कितनी ही सफलतायें••• कितनी तरक्की छूट जाती है हाथों में आते-आते•••!

खुद भी वही देखने लगते हैं! अकसर और

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan