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– मैं – जगदगुरु ! –

मैं – जगदगुरु !

आज गुरु-पूर्णिमा !

सर्वांग सुंदर व संतुलित भारतीय संस्कृति का वह सर्वश्रेष्ठ दिन

जो गुरु को स्मरण कर उनके प्रति अपने कर्तव्य-पालन स्वरूप

उन्हें कोई उपहार समर्पित करने के लिये है.

कुछ और ना दे सकें तो सम्मान ही प्रकट कर दें.

सम्मान ! जो गुरुजनों का सर्वप्रिय है.

यही मेरा भी अभीष्ठ है,

दे रहा हूँ और पा भी रहा हूँ!

हे मेरे जगदगुरु; 

आपको, मुझ जगदगुरु का,  साष्टांग प्रणाम है…. स्वीकारिये!

कौन सा जगद्गुरु?

जी मैं ! और आप भी! जो इस समय इन शब्दों को पढ़ रहे हैं…..!

कैसे ?

जगत के वे सभी जीवित व अजीवित पदार्थ जिनसे हमारा सम्पर्क होता है.  कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ सिखा कर और सीख कर ही जाते हैं… हम कभी-कभी ही ध्यान दे पाते हैं कि हमने किससे कब क्या सीखा… या ध्यान दे भी पायें तो मानने से पीछे हटते हैं… क्योंकि एक से सीख कर दूसरे को सिखाते हुए  आप स्वयं को ही ज्ञानवान  प्रदर्शित कर सम्मान अर्जित करते हैं, और उस मान को पाकर प्रसन्न हो रहे होते हो…. जो आपका था ही नहीं ….  यानी आप,  उस मान को चुरा कर पा रहे होते हो…

मुझसे ना कभी झूठ बोला गया….  ना चोरी कर पाया  …

जहां तक हो सके  ज्ञात के श्रोत को संदर्भ सहित याद रखने का प्रयास करता हूँ…. और बाँटते समय उस श्रोत के साथ श्रेय बांटने से कभी मुझे प्राप्त श्रेय घटा नहीं बल्कि बढ़कर ही मिला …  इसीलिए  श्रेय को श्रोत के साथ बांट कर ही पाना पसंद करता हूँ…  कभी-कभी , किसी कारणवश,  श्रोत का संदर्भ दिये बिना बताने पर,  कोई श्रेय दे भी रहा हो तो टोकता  हूँ कि यह  मेरा अपना अभिमत नहीं वरन इससे मेरी सहमति मात्र है  ….

         फिर भी अनेकानेक सुधि जन शेष रहे होंगे,  जिनके प्रति भी,  मुझे उनके गुरुवत प्रदत्त ज्ञान के लिये कृतज्ञ होना ही चाहिये …. उनके प्रति आदर समर्पित करने का एक प्रयास है…

सच तो यही है कि किसी का भी कोई एक ही गुरु नहीं होता  …  मेरे भी कोई एक ही गुरु नहीं हैं जिनसे मैंने विशिष्ट ज्ञान प्राप्त किया हो …  जगत के सभी जन जो किसी ना किसी तरह मेरे सम्पर्क में आये मेरे ज्ञान के पथ पर पथ-प्रदर्शक ही बने. इसीलिए सबका कृतज्ञ हूँ ….

सभी का…. जिनमें सर्वप्रथम मेरी माँ व पिता हैं जिन्होंने बोलने, सुनने-समझने से लेकर चलने, खेलने पढ़ने का ही नहीं …. सत और असत दोनों को ही जानकर,  सार्थक को चुनने और चुनकर अपनाने की सीख भी दी!  इस सीख के कारण ही हर वह व्यक्ति जिससे मेरा सम्पर्क हुआ, उससे सार्थक निकल कर ज्ञान रूप में मुझमें संचित होता रहा… सीखने की,  पाने की, पाते रहने की प्यास पीते रहने के साथ गहरी और गहरी होती गई… अब भी गहराये जा रही है…

अन्य मुख्य गुरु हैं –  प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय  तक के सभी शिक्षक,  जिनसे अक्षर ज्ञान से लेकर अंतरिक्ष-ज्ञान  तक संभव हुआ.

सभी लेखक, जिन-जिनकी रचनायें मैंने पढ़ीं विश्व प्रसिद्ध लेखकों से लेकर मेरे मित्रों व शिष्यों तक,  सभी लेखक)!. भले उनकी किन्हीं रचनाओं के दृष्टव्य से मेरी पूर्ण असहमति ही रही हो किन्तु … नवाचार का सूत्रधार तो हर एक विचार बन सकता था, तो बना.

 सभी नामी गिरामी व अनाम लेखकों की पुस्तकें,  सभी शास्त्र जिनका हमने अध्ययन किया!जिनसे वैचारिक क्षमता दिनोंदिन निखरती गई और निखरते जा रही है….!

वे सभी नेता व अभिनेता (रंग कर्मी) जो निर्माता, निर्देशक या पोषक के अनुसार स्वयं को  प्रत्यक्ष या पर्दे पर प्रदर्शित करते रहे हैं. जिनके प्रदर्शन से परोसे जाने वाले विषय इतने सजीव लगने लगते हैं… कि कहीं ना कहीं समर्थन या विरोध की प्रबल आकांक्षा जाग ही जाती है!

मेरे सभी मित्र, (परिजन, स्वजन, कुटुंबीजन व निकटजन) जिनके प्रेम, आलोचना व सराहना…  मुझ जैसे सामाजिक प्राणी के, जीवनाधार हैं.  उनकी समालोचना के कारण ही स्वयं का (लगभग) समाकलन करना संभव हो सका…  (स्व-आँकलन तो कई लोग करते हैं किंतु अधिकतर अधो-आकलन या उच्च-आँकलन को ही स्वीकारते हैं ….)

मित्र-रुप में मिलकर शत्रु-भाव रखने वाले विद्रोही जन…. जिनके वर्ताव, दुराव और अलगाव से मानवता के शत्रुओं को पहचानना सरल हो सका और हो रहा है…

हर वह सहयात्री जो किसी छोटी बड़ी यात्रा को सहज या दुष्कर बनाने का उत्तरदायी रहा हो…! जो जाने-अंजाने जीवनयात्रा में पथ प्रदर्शक बनते रहा है… जीवन के दुष्कर क्षणों को सहज होकर बिताने में सहायक …. और सुखकर क्षणों को शीघ्र पहचान कर आनंदमय बिताने में भी….

 स्त्रियां जो मेरी होकर या ना होकर भी…. मेरे जीवन की दिशाओं के निर्धारण का कारक बनीं!

संसार का प्रत्येक सामान्य व्यक्ति अपने योग्य जोड़ा बनाये बिना अपूर्ण है… भले कोई स्वीकारे या अस्वीकार करे …  किन्तु स्त्री-पुरुष दोनों ही ईश्वर की (इच्छित) अपूर्ण रचनायें हैं… पूर्णता की आस भी सभी को है… पूर्णता दोनों के एकांगी होने पर ही मिलती है…. किंतु  शारीरिक एकांग होना या मिलन ही इसकी कसौटी नहीं है…. बिना शरीर को स्पर्श किये भी दो व्यक्ति एकांगी हो सकते हैं… और लगातार शारीरिक सम्पर्क में रहने वाले भी पृथक-पृथक ….  संसार का कोई भी व्यक्ति,  (स्त्री या पुरुष) सर्वगुण संपन्न पुरुष या स्त्री नहीं है … ना ही हो सकता है…. किंतु गुण शून्य भी तो कोई नहीं है …. सभी आदर्श साथी की प्राप्ति के आकांक्षी …. इसी लिये  आदर्श की प्राप्ति भी किसी को नहीं…. किसी में कुछ विशेषताएँ है तो किसी में कुछ और …. मेरे लिये भी यही सिद्धांत लागू है …. मैं अनेक व्यक्तियों का प्रिय हो सकता हूँ….  कई व्यक्ति मेरे भी प्रिय होंगे ….  किंतु सामाजिक स्वीकार्य वरण तो किसी एक का ही हो सकता है… शेष मिलकर भी या बिना मिले ही  प्रेरक बन सकते हैं….  जिसका वरण किया उसपर भी यही लागू है… किन्तु जिसका वरण किया है उनमें सम्पूर्ण नहीं तो सर्वोच्च समर्पण तो  होना ही चाहिये … सो है…! अतः जिन्होंने विचार रूप में भी स्वीकारा उनका …. और जिन्होंने हर प्रकार से नकारा उनका भी कृतज्ञ हँ…. वे मुझमें शेष त्रुटियों को ढूंढ़कर दूर कराने के प्रेरक हैं…!

मेरे वे प्रतिद्वंद्वी जिनसे मेरी वास्तविक प्रतिस्पर्धा रही,  उनसे जय-पराजय को स्वीकारना सीखा, जिनसे मैं विजयी हुआ उनसे, उनकी मुझसे पराजय की भूलों को जानकर ज्ञानार्जन हुआ किंतु जो मुझसे विजयी रहे वे प्रतिस्पर्धी ,अधिक ज्ञानदाता बने… उनसे वह भी सीखने मिला जो मुझमें था ही नहीं…. !

सभी धर्मों के धर्म-प्रवर्तक व प्रचारक

जिनके ध्यान में केवल जनहित रहा होगा  या रहता होगा ….

…. वास्तविक धर्मोपदेशक, धर्म  की मूल अवधारणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’  से हटकर कोई और संदेश नहीं दे ही नहीं सकता….  चाहे वह किसी भी धर्म से संबद्ध हो…! कोई धर्म प्रचारक यदि धर्म के नाम पर हिंसा को उचित ठहरा रहा है तो वह अपने ही धर्म से अपरिचित है… वह नाम का धर्म प्रचारक है… वास्तव में वह एक व्यवसायी है… जो धर्मांधता का व्यापार करता है…! दोनों तरह के धर्म प्रचारकों के कारण सभी प्रचलित धर्मों को जानना आसान हुआ…. उन्हें भी मेरा प्रणाम…!

वे पूजाघर, प्रार्थना स्थल,  मठ और मठाधीश जो प्रेरणा पुंज हैं …. जहाँ समग्र आस्था का वास होता है…. जहाँ की शालीनता उस स्थल और उसके रखरखाव को नियुक्त व्यक्ति को,  उस स्थल में जरा बहुत समय भी बिता सकने वाले श्रद्धालु को भी वहाँ के प्रताप का प्रसाद अवश्य देते है… मेरे मानस पटल में भी ऐसे की कई देव-स्थल प्रसाद स्वरूप  स्थायी हैं…. उन्हें प्रणाम!

वह गगन जिसके आँचल में दिन में सूर्य के तेज को समाने का सामर्थ्य है तो; रात में चाँद सितारों की शीतल चुनरिया बन जाने का गुण भी …. सिखाता है परिवेश के अनुरूप ढलना….

वे पेड़-पौधे जो विषपायी शिव के प्रतिरूप हैं,

जो; तुम्हारे समस्त  उत्सर्जित  को,  विष को;  निर्विकार, मौन रह,आत्मसात कर,तुम्हें जीवनदायी हवा, दवा, पुष्प, पोषण और जीवन देते रहते हैं…   निरास होना … निःआस होकर,  कर्तव्य करते रहकर भी सहज व सुखी होने का संदेश देते हैं… उन्हें प्रणाम!

वे कुएँ, तालाब व नदियाँ जिनकी उपयोगिता व पवित्रता,  हमपर निर्भर है … और हमारे ही लिये है!  ये सभी जलाशय उपयोगी से निःसंकोच उपयोगिता लेने और ना लेने पर भी सर्वजन हिताय शुचिता बनाये रखने की सीख देते हैं…. उन्हें प्रणाम!

आज के दिन इन सभी उपरोक्त वर्णित व अवर्णित गुरुजनों को, उनकी गुरवतों को ,  हृदय की गहराई से विनम्रतापूर्वक  सादर साष्टांग प्रणाम करता हूँ… कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ….!

यदि यहाँ तक पढ़कर किसी को भी मुझमें गुरवत दिखती है, वह मुझसे मेरे संचित ज्ञान कोष में से मुझसे विस्तृत पाना चाहता है तो में उपलब्ध हूँ… यह कोष वितरण से विस्तार पाने वाला है….  सभी का स्वागत है…. भले आप किसी भी जाति, धर्म, वर्ग, संवर्ग से हों….  सारे जग को, भेदभाव रहित,  समान रूप से उपलब्ध हूँ… इसीलिए मैं जगदगुरु हूँ…और इस रूप में ही स्वयं को आप के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ….!

सारे जगत को, गुरु रूप में, शर्त रहित उपलब्ध,  इसलिये जगदगुरु!

  • “सत्यार्चन”
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