रस्सी से गुंथे इंसानी रिश्ते…!

रस्सी से गुंथे इंसानी रिश्ते…!

दो बराबर, मिलती-जुलती सी
सूत की रस्सियां
एक दूसरे से मिल, हो सबल
सार्थक जीने, एक दूसरे में गुंथने
हुई होंगी आकर्षित, तत्पर, चेष्टारत
तब परिचय से परिणय के बीच
अच्छी तरह आंटी गई
दोनों रस्सियों की
खुली होगी ऐंठन
और मिलन तक आते
रस्सियों ने अपने आपको
एक दूसरे से बढ़ चढ़कर
ढीला किया होगा
थोड़ा बहुत उधेड़ा होगा
मिटाया होगा
घटाया होगा
जरा जरा अस्तित्व अपना
दोनों कृषकाय सी
सूत-सूत होती रस्सियों ने
किया होगा एक-दूजे को
एक दूजे के हवाले
एक दूसरे ने देखी होगी
एक दूसरे में ताकत
खुदको उधेड़कर दोनों ने
एक दूसरे को कसा होगा
प्रेममय उमेंठा होगा
एक दूसरे ने
पाया होगा अस्तित्व अपना
एक दूसरे में
तब बना होगा आधार
स्वस्थ परिवार का
दो बिखरती हुई निर्बल
मगर
सतत संग खा-खाकर बल
सूत के रस्से सा हो सबल
बना होगा वह आधार
जिसे कहते हैं परिवार
जिसकी सुतली बन
हमको/ आपको मिला यह संसार…
हम-तुम कपास से कभी
अपनी मांओं के गर्भ में पहूंचे होंगे
मां ने रक्तसिंचित कर
कपास को बना तृण
दे गर्भ में पोषण
सूत सा सुतली सा
जन्मा होगा हमें
मुझे और तुम्हें!
फिर से उनकी ही तरह
हो आकर्षित
हमने
मैंने और तुमने
साथ जीने की
साथ मरने की
उठाई कसम
मगर
ना छूटी ऐंठन,
ना शिथिल तन
ना समर्पित मन
कहने को साथ साथ
चलते रहे
मैं और तुम
ना हो सके कभी हम
बहुत उमेंठा है एक दूजे को
हमने
मैंने
और तुमने
एक दूसरे के नहीं
अपने अपने
आत्मप्रेम में
बंधने नहीं बेधने!
तोड़ने, मिटाने, गिराने
एक दूसरे को
अपने कदमों में झुकाने!
सुनते हैं आज की
यही रीत है
कदमों में बिछ जाये
वही प्रीत है!
जो हो सो हो
हमें तो प्यारी जीत है!
ना बिछेंगे ना बिछायेंगे
ना झुकेंगे ना झुकायेंगे
रोकर नहीं हंसकर
साथ निभायें जायेंगे!
हम प्रेमियों के वंशज हैं
हमें “तुमसे प्यार है!”
छोड़ेंगे ना हम छूटेंगे
हमारे यही संस्कार हैं!
-सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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