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रामनीति – राजनीति ? राम जाने!



रामनीति – राजनीति ? राम जाने…!

आज की राजनीति बहुत जटिल है जी … समझ ही नहींं आती
जैसे आदर्शतम रामराज्य में राजा राम भी नहीं समझ पाये थे
या शायद समझा नहीं पाये थे ….
किसी अकिंचन के सीता मां पर संदेह जताने से
उस राज्य के राजा द्वारा अपनी रानी को त्यागने की घटना  को
उच्चकोटि का आदर्श राजनैतिक आचरण  माना जाता रहा है …
इस अकिंचन सत्यार्चन को तो यह किसी भी राजघराने के रनिवास की मर्यादा का हनन् दिखता है…
मेरी बुद्धि भी उस अकिंचन जितनी छोटी है ना ….
जिसपर आरोप है कि आरोप उसने लगाया था ….
किन्तु क्या श्रीराम के महान रामराज्य में
किसी अकिंचन में इतना साहस था कि
वह महानतम राजा की रानी पर ऐसा घिनौना आरोप लगा सके….
कहीं ऐसा तो नहीं कि
सभासदों में से ही किसी ने किसी अज्ञात काल्पनिक अकिंचन का उल्लेख कर
अपनी बुद्धिजीविता-वश उपजे कुटिल प्रश्न को
उसके बहाने उठाया हो ….
जबकि प्रश्न स्वयं सभासदों का स्वयं का  ही रहा हो?
या
पति राम ने प्रश्न उठाने राजा राम का आवरण ओढ़ा हो  ….
या
व्यक्ति राम अपनी पत्नी की सुरक्षा में असमर्थ रहने की खीझ
अपनी उसी पत्नी को प्रताड़ित कर निकाल रहा हो …..
राम जाने ….!
मगर
हमारे राम जी ने जिस किसी भी कारण से जो भी किया
वह तत्कालीन परिस्थितियों में, सर्वोत्तम ही रहा होगा ….
क्योंकि श्रीराम का सम्पूर्ण आचरण इस योग्य है
कि उनके निर्णय पर संदेह मूर्खता ही होगी …
आलोचना अलग बात है …
पति राम का आलोचक मैं भी हूँ ….
क्योंकि पति-पत्नी संबंधों को मैं
आज के परिप्रेक्ष्य में ही देख पा रहा हूँ ….
तत्कालीन का तो केवल अनुमान ही कर सकता हूँ ना ….!!!
#सत्यार्चन / SatyArchan / SathyaArchan
(वेव पर वैश्विक नाम)
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4 thoughts on “रामनीति – राजनीति ? राम जाने!”

  1. glimpseandmuchmore कहते हैं:

    मेरे ब्लाग पढें, राम और कृष्ण पर आधारित। शायद हमारे विचार आपको सही लगें। कि
    राम ने जो किया वो सही था और है

  2. glimpseandmuchmore कहते हैं:

    राम ने त्यागा नहीं सीता को।पहले की उम्र बहुत लम्बी होती थी, बच्चों को पालपोसकर बड़ा कर, राजपाट भी दे दिया। नाती पोते भभी देख लिए, अब फालतू उम्र कटती नहीं है, वो तो नियंता हैं, अगर यहीं बने रहें गे तो दुनियां का कामकाज कौन चलाएगा।अब कोई बहाना बनाकर निकलना तो पडेगा ही।

  3. Madhusudan कहते हैं:

    बिल्कुल सही लिखा।सबकी अपनी सोच है।अगर भगवान समझते हैं तो कुछ भी बोलना बेकार।अगर इंसान समझते है तो बहुत कुछ है फिर भी उनकी सारी जिंदगी को जीना सबके बस की बात में नही।अपना साम्राज्य अकारण कौन छोड़ सकता है।जीता हुआ लंका कौन छोड़ सकता है।फिर भला अयोध्या की गद्दी से प्रेम कैसा।माता सीता से छल कैसा।जब इंसान राजा बनता है फिर उसे परिश्थिति का बोध होता है जिसे भगवान को भी इंसान रूप में झेलना पड़ा। बहुत अच्छा अपने लिखा है।

    1. सत्यार्चन.SathyArchan कहते हैं:

      धन्यवाद मित्र! आप मेरे कथन के मूल तक पहँचे… लेखन सार्थक हुआ! मेरा व्यक्तिगत व तार्किक अभिमत है कि श्रीराम या श्रीकृष्ण उनके विलक्षण व्यक्तित्व के कारण ईश्वरीय रूप प्रतिष्ठित हुये…. !

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