राष्ट्रोत्थान

“राष्ट्रोत्थान”

“प्रत्येक नागरिक की समपूर्ण व सर्वांगीण प्रगति का सर्वोत्तम प्रयास ही राष्ट्र की उन्नति का प्रयास है” -‘सत्यार्चन’

किसी भी राष्ट्र की भौगोलिक सीमायें मात्र वह कार्यस्थल हैं जहाँ पर राष्ट्र की इकाइयां यानी उस देश के नागरिक अपने-अपने उन्नयन का उत्कृष्ट प्रयास कर अपना राष्ट्रनिर्माण करते हैं …. आइये… अपने-अपने उन्नयन का ईमानदार प्रयास प्रारंभ करें … यही सच्ची राष्ट्रसेवा है…!

किसी भी राष्ट्र की भौगोलिक सीमायें स्वमेव विकसित नहीं होतीं! वहां के नागरिक अपने राष्ट्र की, भौगोलिक सीमाओं में उपलब्ध, अवसरों व संसाधनों का जिस तरह प्रयोग करते हैं उससे ही उस राष्ट्र की प्रगति निर्धारित होती है!

भारत की पहचान भी हम भारत-भारतियों के समग्र प्रदर्शन से ही है!

हर नागरिक, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, का कर्त्तव्य है कि वह जाने, समझे और माने कि “मैं ही भारत हूँ!” उसे अपनी सर्वोत्तम प्रगति का प्रयास आजीवन करते रहना चाहिये! यह उसका कर्त्तव्य भी है, अधिकार भी और यही सच्ची राष्ट्रभक्ति भी!

बस हर ‘भारत’ को अपना विकास इस तरह करना है कि वह अन्य भारत का मार्ग अवरुद्ध ना करे! बिलकुल वैसा ही जैसा कि दौड़ने की प्रतियोगिता में कभी कोई धावक अन्य धावक की टांग बांधकर जीतने का प्रयास नहीं करता!

केवल वही धावक दौड़ जीतता है जो दूसरों की परवाह किये बिना केवल अपनी दौड़ने की क्षमता पर पूरा ध्यान दे सका हो!
-सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

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