रेत हैं हम!

दरिया की गीली रेत
हो गये थे हम
होकर तेरे हवाले
जैसा जी चाहे आकार दे•••
बना ले बदले
तेरी खुशी में थी
खुशी अपनी भी
मगर रेत से खेलने के शौकीन
कभी सोचते क्यों नहीं
रेत के दर्द पर•••
जब तक भाया
एक रूप सजाया
फिर मिटाया
बनाया
मिटाया फिर बनाया
जब जब जैसे जैसे
उनके मन को भाया !
-सत्यार्चन सुबुद्ध (facebook 28012016)

सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan