विचरण अनंत !

बैठे हम भोपाल में, करते कांव कांव!

जी चाहे उड़ जायेंगे… रच लेंगे एक और गांव…!


मन की आंखें, मन के पांव…
चल उठ…बैठे अगले ठाॅंव!


कवि/ कलमकार विषम अनंत
करे भाव विचरण दिग दिगन्त…!


-सुबुद्ध सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

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