विनम्र राजा! -एक लोककथा

विनम्र राजा! -एक लोककथा

प्राचीनकाल में, सोहागपुर राज्य में एक अत्यंत चतुर, बुद्धिमान व यशश्वी राजा का शासन था. राजा का अपनी प्रजा के वास्तविक हालचाल जानने का तरीका अनोखा था. वो अपने दरबार की शुरुआत दरबारियों, मंत्रियों सहित नगर भ्रमण करने से किया करता. रोज चल-दरबार से लौटकर ही राजमहल में दरबार सजता था. राजा नगरभ्रमण पर हाथी, रथ, बग्घी, आदि अलग अलग तरह की सवारियों पर निकलता था आमजनता से भेंटकर उनके हालचाल स्वयं ही पूछता था. एक दिन राजा पैदल ही नगरभ्रमण पर निकला तो मंत्री, दरबारी सबको भी मजबूरन राजा के पीछे पीछे पैदल चलना पड़ा. अपने राजा को अपने समान पैदल चलते देख जो भी स्त्री-पुरुष सामने से आता आदर से अभिवादन, प्रणाम करता. राजा भी उनके अभिवादन का, सर झुकाकर प्रणाम से उत्तर देता जाता… तभी सामने से नगरसेठ और उसकी पत्नी आये, नगरसेठ ने राजा को कमर तक झुककर प्रणाम किया तो राजा नगरसेठ के पैरों में साष्टांग दंडवत मुद्रा लेट गये…. मजबूरन दरबारियों को भी ऐसा ही करना पड़ा. सभी दरबारी राजा के नगर सेठ को साष्टांग दंडवत से आक्रोशित थे, सबने आपस में सलाह कर राजा की इस हरकत के विरोध का निश्चय किया. लौटकर दरबार सजते ही एक वरिष्ठ सभासद ने प्रश्न उठाया “राजन आपका सेठ दम्पत्ति के सामने साष्टांग दंडवत होना किसी भी तरह उचित नहीं आपके इस तरह के आचरण से तो जल्द ही राजसत्ता का मान मिट्टी में मिल जायेगा… “

राजा ने उत्तर दिया “मित्र; मैं कुछ भी सहन कर सकता हूं किन्तु यह नहीं कोई मुझसे अधिक विनम्र हो… और वो व्यापारी दम्पत्ति मेरे अभिवादन में कमर तक झुके हुए थे…

समझिये-समझाइये!

-सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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