शिल्प-वेदना!

 शिल्प-वेदना!

पत्थरों से टकराना 

ठहरा भाग्य 

 वो एक शिल्पकार 
वर्षों हुए बनाते

बुलाने लगे लोग 

 उसे जादूगर 
बदसूरत बेडौल पत्थर

उसका स्पर्श पाकर

स्वरूप पाते सजीव 
निर्जीव पत्थर जी जाते 

मूक पाषाण 

पाते स्वर
 बोलते कुछ  पूछते

शिल्पकार रहता मौन

 झरझर अश्रु होते उत्तर 

पत्थरों का उलाहना

छीनने निश्तब्धता का

कर डालने  का शांतिभंग

 

वेदना रहित थे निर्जीव

अब कलरव से कोलाहल

  आनंद अलौकिक अब निःशेष!
-सुबुद्ध सत्यार्चन 

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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