सुख चाहिए? ये लीजिए! -11 आम या खास…

सुख चाहिए? ये लीजिए! -11 आम या खास…

दुनियाॅं 2 तरह के लोगों से बनी है…
आम और खास!
पहली तरह के लोग “चल पड़ने वाली ट्रेन के बंद दरवाजे मिन्नतों, गालियों या लातों से खुलवाने और अंदर घुसते ही बंद कर फिर किसी के लिए ना खोलने का फरमान सुनाने वाले होते हैं!”
दूसरी तरह के लोग “वैसी ही ट्रेन के पहले से अंदर बैठे / खड़े वो लोग होते हैं जो बाहर छूट गये को अंदर आने देने की आवश्यकता समझते हैं और अंदर से दरवाजा खोलते-बंद करते रहते हैं!”

पहले वाले अमूमन, आजीवन अपने तरीकों से ही अंदर घुसते रह पाते हैं किन्तु दूसरी तरह के लोगों का प्रभामंडल (Oaura/ नूर) विकसित होने लगता है फिर दूर से ही नजर भी आने लगता है और तब उनको बाहर देखते ही ट्रेन के अंदर से लोग दरवाजे खोलने लगते हैं!

अब यह आप पर है कि प्रभामंडल विकसित होने पर विश्वास रख, विकसित होने तक अतिरिक्त कष्ट सहें या आजीवन मिन्नतों, गालियों, लातों से काम निकालते रहें! किसे चुनना है ये निर्णय तो आपको ही करना है…! आम रहना या खास बनना है!
-सुबुद्ध सत्यार्चन

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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