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सुख चाहिये? ये लीजिए! – 10 (असफलता के 10 सूत्र)

असफलता के 10 सूत्र

99% लोग असफलता के  इन्हीं 10 सूत्रों पर चलते हैं••• शायद आप भी•••!

 सफलता का सुख चाहिये तो स्वयं के परिवेश का ईमानदारी से आंकलन करें, इन 10 में से किसी मार्ग पर हों तो मार्ग बदलें, सफल/ सुखी हो जायें!

मैं भी प्रयासरत ही हूँ!

1

  • दूसरों के जिस तरह के व्यवहार*

से आप चिड़ते हैं

  • *की आलोचना करते हैं

*का मज़ाक उड़ाते हैं!

  • वैसा ही व्यवहार स्वयं भी करते रहते हैं! 

2

  • हर किसी प्रशंसक की प्रशंसा से अभिभूत होकर अपना हित-अहित ही भूल जाना!

“प्रशंसा तो हर एक को प्रिय होती है… मुझे भी और आपको भी… किन्तु पर एक प्रशंसक सच्चा नहीं होता, अच्छा नहीं होता समाज में फैले चालबाज़ियों से युक्त लोग आपको ठगने, लूटने के उद्देश्य से भी आप में कोई विशेषता ढूंढ कर या गढ़कर आपकी प्रशंसा कर रहे होते हैं…  प्रशंसा करने वाले से उत्साहित होकर उसकी हर थ्योरी को उचित मानने बाध्य हो जाने से आप उसे, आपको या आपके अपनों को ठगने का मार्ग दे देते हैं ! परिणाम में नुकसान की संभावना अधिक होती है या कई बार उठाना ही पड़ता है!

3

  • प्रशंसा की अपेक्षा सबसे रखना, किन्तु प्रशंसा करने में कंजूस होना! 

आपकी ही तरह हर कोई अपने पाये हुए, मिले हुए , किये हुए, के प्रति  गौरवान्वित हो या ना हो किन्तु सार्वजनिक रूप से वह गौरवान्वित ही प्रदर्शित रहना चाहता / चाहती  है, जैसे कोई आपके बनवाये या खरीदे हुए मकान, आपकी संतान, आपकी उपलब्धि आदि की सराहना कर आपको अपने प्राप्त पर गौरव का अनुभव कराता है वैसे ही यदि आप दूसरों को नहीं करा पाते हैं तो शीघ्र ही आप भी ऐसी प्रशंसा से वंचित होते जायेंगे!

4

  • त्रुटि इंगित कर सुधार के मार्ग  सुझाने वाले से  दूरी बना लेना! 

जिन्हें आपकी नाराज़गी से अधिक आपके हित की चिंता होती है अक्सर वे ही आपके सच्चे मित्र होते हैं. किन्तु कई लोगों में अपनी कैसी भी आलोचना  किसी से भी सुनना इतना अप्रिय लगता है कि वे धीरे-धीरे अपने सच्चे मित्रों को खोते जाते हैं और केवल स्वार्थी चाटुकारों से घिरे रह जाते हैं.

5

  • श्रेय लेने में सबसे आगे किन्तु श्रेय देने या जिम्मेदारी लेने से दूरी बनाये रखना! 

किसी समस्या का उचित समाधान या आयोजन का सफल प्रबंध करने में आपके सफल रहने पर उपस्थित लोगों में से अधिकांश से/ किसी किसी से / किसी से आपको इसका श्रेय दिये जाने पर जैसी प्रशंसा आपको होती है वैसी ही अन्य को भी होती ही होगी…  किसी के किये गये किसी भी कार्य के संचालन पर उसे उसका श्रेय या प्रशंसा या दोनों ही ना मिलें तो भविष्य में वह आपके लिये किसी अन्य अवसर पर  उतने मन से कार्य नहीं कर रहा होगा. धीरे धीरे निराश हो वेमन से कार्य करने लगेगा. यदि आप श्रेय देने और प्रशंसा करने में कंजूसी करते हैं तो धीरे धीरे आपका प्रभाव, उद्योग, व्यवसाय, समाज या परिवार आपसे छूटते जायेगा.

6

  • दूसरों के जिस त्याग, आदर्श और संघर्ष के प्रशंसक हैं स्वयं को उन आदर्शों से दूर रखना!

कई लोग ऐसे भी हैं जो गाहे-बगाहे, मौके-बेमौके  लोगों की जमकर प्रशंसा करते हैं, उनके जैसे आचरण को अपनाने योग्य भी बताते हैं किंतु अपनाने की शुरुआत कभी नहीं कर पाते… ऐसे लोग ताली बजाकर विशिष्ट लोगों के कृपा पात्र तो  बन जाते हैं किन्तु स्वयं कभी विशिष्ट नहीं हो पाते.

7

  • स्वयं को सम्पूर्ण समझकर केवल दूसरों में ही सुधार की गहन अपेक्षा और प्रयास भी!

कुछ लोग स्वयं को इतना समझदार समझते हैं कि वे अन्य लोगों को अयोग्य, नादान, नासमझ या मूर्ख समझने लगते हैं.  ऐसे लोग सभी में सुधार लाने का प्रयास करते रहते हैं किन्तु अपने अंदर झांककर देखने में अक्षम होते हैं. ऐसे लोग अकसर अंधों में काने राजा जैसे होते हैं और सदैव अंधों के बीच ही रहना / बसना पसंद करते हैं. स्वाभाविक रूप से स्वस्थ आँखों वालों के सामने ये तुच्छ होते हैं क्योंकि ये  अपनी एक आँख से देखते हुए भी अपनी दृष्टि पर गौरव करते रहते हैं… अपनी दूसरी आँख के स्वस्थ होने की सम्भावना होते हुए भी उसपर चर्चा तक नहीं करना चाहते…. ये आजीवन अपूर्ण व्यक्तित्व वाले ही रहते हैं. ये लोग मानते हैं कि ये दुनियाँ! ये महफिल मेरे काम की नहीं•••• क्योंकि दुनियाँ बहुत गंदी है और मैं निर्मल! दोष तो सदैव दूसरों का ही होता है… ये अपनी कमियों की ओर देखना ही नहीं चाहते, चाह लें तो देख नहीं पाते, देख लें या कोई और बताये तो स्वीकार  नहीं पाते, स्वीकार भी लें तो सुधारना नहीं चाहते,  सुधारना भी चाह लें तो सुधार के लिये आवश्यक मार्ग, मार्गदर्शन या इच्छाशक्ति ही नहीं जुटा पाते!

8

  • स्वयं को दीनहीन, अकिंचन व नैसर्गिक दोषी मानना…

मुस्लिम, ईसाई, हिन्दुओं जैसे बड़े धर्मों की प्रार्थनाओं में स्वयं को (केवल उस सर्वोपरि के सम्मुख) पापी, तिनके समान और अवगुणों से युक्त होने को बोलते रहने से स्वयं को सर्वशक्तिमान के अतिरिक्त शेष संसारियों से भी निकृष्ट, निरीह व अकिंचन होना ही अपनी नियति मान लेते हैं! सभी धर्मों के धर्मानुयायी धर्माचार्यों को ही धर्म पालन योग्य मानकर स्वयं को अपने ही धर्म के पालन के अयोग्य मान लेते हैं. जबकि किसी भी धर्म में धर्माचार्य और धर्मानुयाइयों के लिये अलग-अलग आचारसंहिता नहीं है. प्रार्थनाओं में  वर्णित ‘अकिंचन’  के पीछे का यथार्थ ना समझ पाने से स्वयं में सुधार की संभावना ही समाप्त कर लेना.

9.

  •  ना अवसर को पहचानना ना उसका लाभ उठाना. 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समय समय पर अनेक अवसर उपस्थित होते रहते हैं किंतु अधिकांश लोग अवसर को पहचान ही नहीं पाते, पहचान लें तो उस अवसर का पूरा लाभ उठाने का निर्णय नियत समयसीमा में नहीं कर पाते , निर्णय कर लें तो उसपर चल नहीं पाते. सामानयत: जीवन में असफलता का बहुत बड़ा कारण यही होता है.

10.

  • योजना विहीन प्रयास कर लक्ष्य साधने के प्रयास में समय, धन व ऊर्जा व्यर्थ गँवाना.

अवसर को देर सबेर पहचान कर, लक्ष्य निर्धारित कर लेना किन्तु योजना बनाये बिना मुँह उठाकर चल देने से साधारण लक्ष्य की प्राप्ति में भी भ्रमित होते रहकर समय, धन व ऊर्जा का अपव्यय ही होता है. उदाहरण के लिये किसी दिन आपका ड्राइवर छुट्टी पर है और आपकी महत्वपूर्ण बिजनेस डील के लिये कोई वी आई पी आया हुआ है जिसे एयरपोर्ट से आपको गाड़ी लेकर लेने जाना पड़ रहा है, आपके घर / आफिस से एयरपोर्ट 25-30 किलोमीटर दूर है और पहुंचने के 3-4 रास्ते हैं. आप ड्राइवर पर झल्लाते हुए गाड़ी निकालकर चल देते हैं…  नेवीगेटर की मदद भी नहीं लेते और चल देते हैं 3-4 कि मी दूर पहुँचने पर आपको लगता है कि आपने गलत रास्ता चुना है दूसरा रास्ता इससे बेहतर होता…  और आप 1-1-1/2 कि मी का डायवर्शन लेकर दूसरे रास्ते से पहुँचने का प्रयास करते हैं. आपके पहुँचने तक अतिथि टैक्सी अरेंज कर लेता है किन्तु आप पहुँच जाते हैं और वह टैक्सी छोड़कर आपके साथ ही आता है. ऐसी स्थिति में आपकी व्यावसायिक डील मीटिंग के पहले ही 90% असफल हो चुकी रहेगी. छोटी-छोटी चीजों को व्यवस्थित तरीके से करने की जरुरत इसीलिए होती है कि आपकी आदत में व्यवस्थित रहना शामिल हो. कुछ भी करने से पहले योजना बनाने में कुछ समय अवश्य खर्च किया जाये और योजनानुसार ही उसपर अमल किया जाये तो जीवन सफल नहीं तो असफल करने के लिये किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती बस आपको ज़रा सा लापरवाह भर होना होगा! 

-सुबुद्ध सत्यार्चन

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