सुख चाहिये ये लीजिए -10- बुद्ध-सुबुद्ध 

स्वर्णिम मॊके का फायदा उठाने से बेहतर है, हर मॊके को स्वर्ण में बदल डालना!

सुख चाहिये ये लीजिए -10- बुद्ध-सुबुद्ध

(एक पुनर्संयोजित व पुनर्प्रसारित लोक कथा!)

एक गाँव में एक ज्ञानी जी परिवार सहित रहते थे, उनकी ख्याति दूर दूर तक फैली थी।

उसी गाँव का राजा नगर मार्ग के पास रोज एक खुला दरबार लगाता था, जिसमें सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं। एक दिन ज्ञानीजी को विशेष आमंत्रित कर खुले दरबार में बुलवाया गया था। दरबार चल रहा था तभी *ज्ञानी जी का बेटा सामने वाले मार्ग से रोज की तरह नौकरी पर जाने के लिये निकला। राजा ने लड़के को देखते ही दरबारी को इशारा किया और दरबारी ने लड़के को बुलवाया, राजा ने अपने एक हाथ में सोने का व दूसरे में चांदी का सिक्का रखकर, जो अधिक मूल्यवान है वह लेकर जाने को कहा… लड़के ने चांदी का सिक्का उठाया और चल दिया। सभी दरबारी जोर से ठहाका लगाकर हंस पड़े!

लड़के के जाते ही राजा ने ज्ञानी से कहा –

“महाशय, आप इतने ज्ञानी हैं, इतने पढ़े लिखे हैं पर आपका लड़का इतना मूर्ख क्यों है? उसे भी कुछ सिखायें। उसे तो सोने चांदी में से क्या मूल्यवान है यह भी नहीं पता!

यह कहकर राजा जोर से हंस पड़ा.. ज्ञानीजी आक्रोश में आये किन्तु चुपचाप घर आ गये। शाम को, लड़के के घर आते ही उन्होंने पूछा

“सोना व चांदी में अधिक मूल्यवान क्या है?”

“सोना!” लड़के ने उत्तर दिया।

“जानते हो ना, फिर सुबह राज दरबार में तुमने चाँदी का सिक्का क्यों चुना? सभी के बीच मेरी खिल्ली उड़ाई गई!”
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लड़का हँसा व हाथ पकड़कर पिता को अंदर ले गया

और कपाट से एक पेटी निकालकर दिखाई जो चांदी के सिक्कों से भरी हुई थी।
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यह देख कर ज्ञानी जी हतप्रभ रह गये।

.”मैं उस मार्ग से रोज नौकरी पर जाने के लिये निकलता हूँ वे लगभग रोज मुझे बुलाते हैं व मज़ा लेते हैं। ऐसा तक़रीबन हर दिन होता है। जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया उस दिन से यह खेल बंद हो जाएगा••• वो मुझे मूर्ख समझकर मज़ा लेते हैं तो लेने दें, यदि मैं बुद्धिमानी दिखाउंगा तो कुछ नहीं मिलेगा•••
आप जैसे ज्ञानी का बेटा हूँ अक़्ल से ही काम लेता हूँ!”

मूर्ख होना अलग बात है और मूर्ख समझा जाना अलग•••!

*स्वर्णिम मॊके का फायदा उठाने से बेहतर है, हर मॊके को स्वर्ण में बदल डालना!
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यह सत्य है कि *बुद्धि कुलगत परिष्कृत होती रहती है इसीलिए अगली पीढ़ी पर संदेह व्यर्थ है!

*“सत्यार्चन” जानते हैं कि इस पोस्ट को केवल ज्ञान मार्गियों द्वारा ज्ञानमार्गियों को ही अग्रेषित किया जायेगा!

जब जिसका शुभ समय सन्निकट आयेगा, तभी वह सन्मार्ग अपनायेगा और तब ही सम्मुख हो प्रत्यक्ष सम्पर्क कर पायेगा!

*सन्मार्ग की जय हो!

– सत्यार्चन
मो• 88 2 7475 888

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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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