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सुख चाहिये? ये लीजिए! -9

सुख चाहिये? ये लीजिए! -9 

*हम अपने स्वयं के  सबसे अच्छे मित्र और सबसे बड़े शत्रु होते हैं क्योंकि हमको हमसे ज्यादा कोई और नहीं जानता ना ही जान सकता और केवल हम ही हममें कोई परिवर्तन कर सकते हैं••• कोई दूसरा नहीं! *

-हम अपने आपके बिषय में अकसर अनेक उद्घोष करते रहते हैं! जैसे- मुझसे यह सहन नहीं होता, देखा नहीं जाता, किया नहीं  जाता, रहा नहीं जाता, खाया नहीं जाता, पिया नहीं जाता, उस तरह/ वैसी जगह/ऐसे समय  सोया नहीं जाता ! आदि आदि •••
इनमें से कुछ या अधिकांश ऐसे उद्घोष सम्मिलित होते हैं जिनका हमने कभी सामना ही नहीं किया होता / जिनको कभी आजमाया ही नहीं होता! जैसे लौकी की सब्जी पर जोक्स सुन-सुन कर
लौकी की सब्जी के प्रति अरुचि प्रकट करना!
और
*उस लौकी (या आलू, बेंगन, टमाटर, गोभी, भिण्डी, पनीर या अन्य)  की सब्जी के प्रति, बचपन से ही, अरुचि प्रकट करते-करते, वास्तव में उससे अरुचि हो भी जाती है!*
जबकि कई बार वह सब्जी या डिश हमने कभी चखकर भी नहीं  देखी होती! फिर भी अरुचि हो जाती है!  अधिकांश शाकाहारियों  में मांसाहार के प्रति ऐसी ही अरुचि भरी होती है जिसके कारण उन्हें जबरन मांसाहार के लिए विवश किये जाने पर उनको वास्तव मेंं  उल्टी तक हो जाती है! 

*क्यों होता है ऐसा?*

असल में शाकाहारी परिवार में जन्म कर बड़ा होता व्यक्ति, बचपन से ही, मांसाहार की निकृष्टता के  प्रति दुर्भावना वाले  विचार सुनते हुए बड़ा हो रहा होता है!  जो उसके उपचेतन मन में हर बार सुरक्षित होते रहकर मांसाहार के प्रति उसकी मन में वितृष्णा के भाव को स्थायित्व देकर, यही उस व्यक्ति का संस्कार बना देता है!
यही यथार्थ, मांसाहार के अतिरिक्त  अन्य वस्तुओं/  तथ्यों के प्रति  पसंद/ नापसंद/  संस्कार/  आदत/ नफरत बन जाने /बनाये जाने पर भी लागू होता है!
बस एक चीज सभी संस्कारों में सामान्य रूप से उपस्थित होती है और वह है उस तथ्य का बार बार दोहराया जाना या असाधारण तरीके से सामने आना!
कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि घोर शाकाहारी परिवार के संस्कारों में पला बच्चा बड़ा होकर दोस्तों के साथ मांसाहार आजमाने शुरु में अनमने मन से तैयार हो जाता है और धीरे धीरे वह  सहज मांसाहारी हो जाता है!
मैं यह नहीं कह रहा कि मांसाहार उचित है,  किन्तु यदि मांसाहार का धुरविरोधी व्यक्ति, अपने ही दृढ़  संस्कारों के परिवर्तन के  प्रयास में सफल हो सकता है तो कोई भी व्यक्ति अपनी किसी भी आदत या अरुचि को बदलकर रुचिकर बना ही सकता है!
यदि आपको भी अपनी अनुचित अरुचियों को बदलने की आवश्यकता मेहसूस होती है तो आपको भी वैसा ही करना चाहिए जैसा कि शाकाहारी व्यक्ति मांसाहारी बनने के लिए कर रहा होता है!
पहले अपनी उस चुनी गई  अरुचि जिसे आप बदलना चाहते हैं  को आजमाने के बिषय में सोचने स्वयं को तैयार करना होगा,  फिर आजमाना होगा,  एक दो बार या अनेक बार आजमाये जाने पर कुछ भी अपनाया जा सकता है! अरुुुचिकर को रुचिकर या अति रुचिकर भी बनाया जा सकता हैै! 

   *रुचिकर और अरुचिकर में से उचित और अनुचित के आधार पर चुनने के बाद  किसी भी रुचिकर को अरुचिकर और अरुचिकर को रुचिकर में बदला जा सकता है!*

(अगले कड़ी में नींद की समस्या से  छुटकारा पाने पर चर्चा करेंगे!)

*-सत्यार्चन 

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