सुख चाहिये? ये लीजिये! -11- फिलाॅसफी

भूलों को सुधारते सुधारते सुधरकर ही मानव मनीषी हो सकता हैं! अन्यथा पशु से क्या भिन्नता रही!

फिलासफी जो यथार्थ आधारित हो, जीवनोपयोगी हो वही सम्माननीय है!

अनुकरणीय है!

नदियों को ही ले लीजिए… गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु या सतलज ऐसी एक भी प्रतिष्ठित नदी नहीं जो अपने आकार की विशालता की कारक केवल स्वयं हो, हर बड़ी नदी अन्य अनेक नदी नालों को समाहित कर, अन्य का अस्तित्व स्वयं में समाकर ही अपनी प्रतिष्ठापूर्ण विशालता को पाती है!

अस्तित्व खोने वाली भी नदियां ही हैं और समाहित करने वाली भी! जिसमें जो सबसे अधिक विनीत है, (निचले तल पर है) उसी में आकर अन्य नदियां समाती हैं! अपना अस्तित्व खोती, समाहित होती नदी का प्रतिरोध रहित समर्पण होता है! पूर्णतया प्रकृति के अनुरुप! किन्तु क्या नदी में नदी के समर्पण से समर्पित नदी वास्तव में अस्तित्व हीन हो जाती हैं? गंगा-यमुना संगम ना होता तो क्या तब भी गंगा वैसी ही विशालता पाती? और गंगा में मिलने से यमुना की महत्ता घटी या बड़ी?

ऐसा ही यह संसार है!

प्रत्येक व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) एकल है तो निर्बल है! अस्तित्व हीनता के निकट है! जीवन निष्फल है! विनीत है तो विशालता सुनिश्चित है! सौहार्द सफलता की कुंजी है! सामंजस्य बिना सौहार्द संभव नहीं! त्याग बिना सामंजस्य कैसे संभव! अवतार सहित आज तक संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ जिससे कभी कदम बढ़ाकर वापस ना खींचे हों! जिससे कभी कोई भूल ना हुई हो और ना ही कोई ऐसा जिसने भूल सुधार का प्रयास ना किया हो! यह भूल सुधार वापसी ही तो है! नहीं तो क्या है?

भूलों को सुधारते सुधारते सुधरकर ही मानव मनीषी हो सकता हैं! अन्यथा पशु से क्या भिन्नता रही!

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

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