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सुख चाहिये? ये लीजिये-3 ( सफलता का साधन भी है गीतोपदेश में…)

सुख चाहिये? ये लीजिये-3 (सफलता का साधन भी है गीतोपदेश में…)

गीता के प्रचलित सार “कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर रे इंसान….” को

मानना मेरे लिये उचित नहीं लगता …

मुझे लगता गै कि
सम्पूर्ण जगत का सार कर्म में ही है ! 
इस कर्म विधि 
(कर्मण्ये वाधिकारस्ते , मा फलेसु कदाचनः •••
(कर्ता का) कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कदापि नहीं ! यह गीतोपदेश का वास्तविक सार है!)
अर्थात
जिस समय जिस कर्म में रत हो उस समय उस कर्म में शतप्रतिशत रत रहो !
अर्थात
किसी भी कार्य /क्रिया को करते हुए

*उसमें अपना सम्पूर्ण ध्यान,

*अपनी समस्त ऊर्जा,

*सर्वोत्तम प्रवीणता,

*अपने पूरे सामर्थ्य सहित

उस क्रिया में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दो !

यही तुम्हारा कर्तव्य है!

*कर्म का फल तो क्रिया के होने में ही निहित है, क्रिया के होते-होते फल भी निश्चित होता जाता है

किन्तु इस फल की उत्पत्ति तो क्रिया के समापन पर ही संभव है!*

समूची दुनियाँ के समस्त प्रेरक (Motivators)  सफलता पाने की जो-जो राहें अपनी-अपनी भाषा / शैली में बताते हैं उन विधियों का आधार

सर्वाधिक उचित रुप में गीता में युगों पूर्व से वर्णित है!

टिप्पणी – यदि तुम्हें तुम्हारे कर्मों का फल अन्य की तुलना में यथेष्ठ प्रतीत नहीं होता या न्यूनाधिक लगता तो तो यह तुम्हारा मतिभ्रम है !
क्योंकि
अन्याय की क्षमता भिन्न है!

अतः अन्य का उसी क्रिया को करने में 100 % समर्पण का प्रयास•••,

तुम्हारी तुलना में न्यूनाधिक सफल रहा हो सकता है,

इसीलिए, परिणाम भी भिन्न हो सकता है!

किसी को भी किसी अन्य के स्थान पर तुलना (एवं प्रतिस्पर्धा भी) स्वयं से ही करनी चाहिए!
प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति में सफल या असफल होने के बाद स्व-आंकलन कर अपनी कमियों को दूर करते हुए अपने आपको सफलतम बनाने की दिशा में योजनाबद्ध तरीके से बढ़ते जाना चाहिये!

इसी में जीवन की सार्थकता है!

ऐसे ही जीवनोपयोगी संदेश हैं “गीता जी” में!

(जिन्हें जीवन में सहजता से सफलताओं की कामना है उनको सत्यार्चन की सलाह है कि वे व्याख्याओं के स्थान पर

कृपया गीतोपदेश को मूल /अनुवाद रूप में  ही  पढ़ें…)

  • सत्यार्चन 
  • SathyaArchan (Global @ Web Search)
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1 thought on “सुख चाहिये? ये लीजिये-3 ( सफलता का साधन भी है गीतोपदेश में…)”

  1. Madhusudan कहते हैं:

    phal hamare haath men nahi phir uske baare men soch apna samay kyun barvad karna aur karm hamare haath men hai phir kyun na ham karm ke baare men hi soche aur nirantar karte rahen………phal nischit aayega…….shayad Geeta ka yahi mantra hai…………bahut hi badhiya post.

अच्छा-बुरा... कुछ तो कहिये...

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