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सुख चाहिये? ये लीजिये!-7- सत चिंतन…

सुख चाहिये? ये लीजिये!-7- सत चिंतन...

ईश्वर को समझना है तो आत्मा को समझें …

बिल्कुल राष्ट्र को समझने के लिये नागरिक को समझना की तरह …

किसी भी राष्ट्र की इकाई उसके नागरिक हैं …

इसीलिये मैं कहता हूँ

“मैं भारत हूँ”

किन्तु केवल मैं ही भारत नहीं हूँ

वरन् मैं भी भारत हूँ

ठीक आपकी ही तरह…

आपके मेरे और अन्य भारतों (तथा भारतीयों) की

प्रगति को ही

भारत देश की प्रगति कहा जायेगा…

भौगोलिक सीमाओं से घिरी धरती स्वयं कोई प्रगति नहीं करती

ना कर सकती

हमारे राष्ट्र की भौगोलिक सीमा में बसे हम नागरिक ही

प्रगति या अवनति करते हैं …

हम सबकी “समग्र प्रगति” ही राष्ट्र की प्रगति है…

वैसे ही आत्मा है …ईश्वर की इकाई…

हमारे जैसों के आत्मचिंतन में शुभ है

तो अन्य के अशुभ…

हमारे “समग्र चिंतन” का परिणाम ही

हमें; प्रकृति से, प्रतिफल में प्राप्त हो रहा है

समस्त आत्माओं के

“समग्र प्रयास” की परिणति ही ईश्वरीय लीला है…

“वो” केवल वही दिखायेगा जो हमारे “समग्र दर्शन” में हम चाहते हैं…

“वो” केवल वही करेगा जो हमारा “समग्र-अपेक्षित” है…

कलयुग की पराकाष्ठा में अशुभ तिंतन

दिनोंदिन, शुभ चिंतन से बड़ा होता जाना है

हो रहा है…

शुभ सिमटते जाना है…

“शुभ-चिंतक” दिनों दिन “अशुभ-चितकों” के आगे घुटने टेकते जाने हैं

टेकते जा रहे हैं

शुभ सिमट रहा है…

और

अशुभ अपनी ताकत पर मद में चूर होकर

निरंतर अशुभ चिंतन कर प्रलय का कारण बनने ही वाला है…

प्रलय सन्निकट है…

यह प्रलय समूचे अशुभ चिंतकों को “मोक्ष” प्रदान करेगी

और मुट्ठी भर शेष शुभ चिंतक

अगले सतयुग के प्रणेता बन

फिर से संसार की रचना करेंगे…

….

*थोड़ी सी देर के लिये कल्पना कीजिये

कि प्रलय हो चुकी है

और आप तथा 23 अन्य जन ही

आल्प्स जैसे पर्वत की चोटी पर आपके साथ जीवित बचे हैं

यानी कुल 24 जन ही संसार में “आदम स्थिति में” जीवित बचे हैं ….

साधनों के नाम पर ना तो अन्न है ना ही वस्त्र

पर्वत की जरा सी चोटी पर इकट्ठे आप सब …

शेष संसार जलमग्न हो नष्ट-भ्रष्ट हो चुका है….

बार-बार जल की बड़ी-बड़ी लहरें

आपकी आश्रय बनी पर्वत की चोटी को डुबो दे रही हैं…

हर एक लहर के साथ एकाध साथी बहकर

कम या घायल होने का अंदेशा है

या होते जा रहा है….

इनमें कुछ स्त्रियाँ हैं और कुछ पुरुष ….

कुछ स्वस्थ हैं तो कुछ घायल….

सभी नग्न!

आप स्वस्थ हैं तो क्या आप घायलों के

उपचार / देखभाल के इच्छुक ना होंगे ?

किसी घायल की पीड़ा से परेशान ना होंगे…?.

सभी एकजुट होकर लहरों में किसी के भी

बहकर कम ना होने देने का प्रयास ना कर रहे होंगे…?

निश्चय ही कर रहे होंगे …!

आपमें से प्रत्येक एक दूसरे के साथ खड़ा होगा …

बिना जात-पांत, रंग-नश्ल, लिंग का भेद किये …

सब एकदूसरे के साथ खड़े होंगे …

कोई भेद शेष ना रहेगा!

सब सबके लिये, सब तरह से, समान रूप से सहयोगी!

तब सबके हित में ही सबका हित होगा!

अन्य का अहित चिंतन तो कल्पना में हो ही नहीं सकेगा!

सबसे सभी दुर्भावनाओं का समूल नाश हो चुका होगा!

बस यही तो होगा सतयुग का सूत्रपात!*

……..

ऐसे ही सतयुग पहले भी कई बार आये

और कलयुग में समाप्त हुए ….

फिर होगा और तब तक निरंतर चलता रहेगा

जब तक कि पृथ्वी की आयु शेष है…

अंत में महाप्रलय होगी जब पृथ्वी पूरी तरह प्रदूषित हो

जीवन के सर्वथा अयोग्य हो जायेगी

तब पृथ्वी ब्लैकहोल में जा समायेगी…

तब तक ऐसा ही चतता रहेगा…

सतयुग से प्रारंभ और कलयुग पर अंत…

  • सत्यार्चन
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