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सुख चाहिये? ये लीजिये! – 8

बनावटी युग में जीते हुये हम बनावटी होते गये!

सच तो यह है कि जिन छोटी छोटी चीजों में / बातों में हम खुश हो सकते हैं उनमें सम्मिलित होना ही हम ओछापन /स्तरहीनता मानने लगे !

अगर इसे समझना है तो यूँ करें कि अपने आसपास के लोगों के दिखावटीपन और शर्मसार होने के आधार पर क्रमवत छांटें और उनके खुश होने ना होने का आंकलन करें!

दिखावटी लोग उन्हीं चीजों में दोष निकालते और शर्मसार धिक्कारते हुए दिखेंगे जिनकी कि प्रशंसा की जानी चाहिए थी!

आप जो हो, जैसे हो खुलकर जियो!

दूसरों को भी उसी नजरिए से देखो जो खुद के लिए रखा है! अपने दैनिक जीवन में होती छोटी छोटी बातों में यथासंभव अच्छाई खोजना शुरू करें! होते हुए छोटे बड़े अच्छे के लिये खुश होकर अपने ईश्वर का धन्यवाद करें! कुछ अच्छाइयाँ रोज ही होती हैं जिन्हें हम नजरंदाज करते रहते हैं जैसे आप रोज सुबह जब नींद से उठते हैं तो आपको ईश्वर के प्रति आज भी जीवित रखने के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए क्योंकि दुनियां में जाने कितने लोग रात सोने के बाद सुबह जीवित नहीं मिलते! जब-जब आप भोजन करने बैठें तब-तब ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए उस भोजन के उपलब्ध कराने और उससे बहुत अधिक भोजन करने का अवसर देने के लिए क्योंकि दुनियां की 20% आबादी भूख मिटाने के साधन रोज नहीं कर पाती और दुनियाँ के 1•5 % धनकुबेर जिनके पास दुनियाँ की 80% सम्पदा है उन्हें आराम से या छककर भोजन करने का अवसर जीवन में गिनीचुनी बार ही मिल पाता है! यानी खुशी का आधार आर्थिक सफलता मात्र तो नहीं ही है!

प्रतिदिन खुश होने के अनेक अवसर होते हैं जिन्हें हम देख ही नहीं पाते!

खोजना शुरू करें फिर देखना खुशी आपसे बच कर कहीं नहीं जा पायेगी!

खुश होना आ गया तो जीना आ गया !

जीना आ गया तो सबसे बड़े सुख की ओर बढ़ना आ गया !

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