साथ की बात…

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साथ की बात…

साथ (यानी रिश्ता) कम से कम 1+1 यानी 2 का होता है…


रिश्ते का स्थायित्व दोनों पक्षों में उपस्थित सहचर्य, सहिष्णुता, स्वीकार, सहानुभूति, सहनशीलता पर निर्भर है !


‘साथ’ / रिश्ते का माधुर्य तथा कटुता-
एक दूसरे की आवश्यकता, अनुकूलता, सुविधा, असुविधा, रुचि और अरुचि को मिलने वाले समर्थन और विरोध पर निर्भर होते हैं!

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कुछ ऐसी वजहें होती हैं जो रिश्तों में नजदीकियों और दूरियाँ का कारण बनती है जैसे…


– उसे; तेरी जरूरत तो बिन बोले ही दिख जाती है …
और वो;
तुझसे बोल बोल थक जाये तो भी तुझे समझ नहीं आती है!
– सत्यार्चन

अच्छा या बुरा जैसा लगा बतायें ... अच्छाई को प्रोत्साहन मिलेगा ... बुराई दूर की जा सकेगी...

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