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सामाजिक शिक्षण  

सार्वजनिक ‘ज्ञान वितरण पथ’ के पथिकों  को अपना मंतव्य प्राध्यापक (प्रोफेसर) भाव से रखना चाहिए! शिक्षक नहीं बनना चाहिये!

 शिक्षक  का दायित्व किसी भी प्रकार सिखाने का होता है क्योंकि वह बच्चों को सिखा रहा होता है!

 जबकि प्रोफेसर का दायित्व उद्बोधन देने तक का ही होता है••• (जिसे उचित लगे ध्यान से सुने- गुने जिसकी मर्जी हो अनसुना कर मस्ती करता रहे!) क्योंकि प्रोफेसर वयस्क हो चुके बच्चों को सम्बोधित कर रहा होता है! 

          सार्वजनिक सम्बोधन में तो अधिकांश परिपक्व व्यक्ति ही होते हैं, हर एक से, हर बात के समर्थन की आशा करना ही व्यर्थ है!सामान्यतः ऐसा प्रवक्ता विशिष्ट संस्कारों  के प्रत्यारोपण का प्रयास कर रहा होता है वह भी उनमें जिनमें पूर्व संस्कारों का वन पहले से उपस्थित है इसीलिए ऐसे प्रवक्ता को सबकी भावनाओं का ध्यान रखते हुए संतुलित व सारगर्भित सम्भाषण को आरोपित करने के प्रयास की अपेक्षा प्रक्षेपित करना ही उचित है! 

इसीलिए कई ऐसे श्रेष्ठ व सफल शिक्षकों के उदाहरण आसपास दिख जाते हैं जो घरेलू या सार्वजनिक जीवन में पूरी तरह असफल  सिध्द हुए! 

इसी तरह पाठक/ श्रोता/ दर्शक का प्रबल-प्रखर या तीक्ष्ण विरोध भी अपरिपक्वता का ही है द्योतक  है, जिससे  बचना चाहिए!

-सत्यार्चन 

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