कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें! 

*कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें!*

जिसकी गोद में खेलकर बड़े हुए, जिससे सब कुछ अधिकार पूर्वक लेते रहे, उसकी तरफ भी, कुछ तो जवाबदेही बनती है ना हमारी…!

*प्रकृति / कुदरत से, बस कर्ज लिये जा रहे हैं… इस कर्ज को   उतारने की क्यों नहीं सोचते?*

क्या नहीं लेते हैं हम प्रकृति से…? और जो भी लेते हैं ज्यादातर प्रकृति को नोंचकर! सुख के साधन जुटाने और जीवन यापन योग्य होने लायक शुरुआती शिक्षा (हाँ. से. तक की ही) पाने में, हम अमूमन 20-25 पेड़ों को काटकर बनाये गये कागज का उपयोग कर चुके होते हैं…! और पेड़ लगाने की कौन-कब सोचता है?

*क्या यह कृतघ्नता नहीं है?*

*अच्छा है कि; सब के सब कृतघ्न नहीं हैं…! आप भी मत रहिये!*स्वयं के लिये, स्वजनों के लिये या मानवता के लिये…*कृतघ्नता त्यागिये!*

*पेड़ लगाइये!*

*पहले से लगे पेड़ों को कटने मत दीजिये!!*

*बढ़ते पौधों को पानी की कमी से मरने मत दीजिये!!!*

(अपने उपयोग किये गये / अतिरिक्त बहते पानी को ही पेड़ों की ओर मोड़ दीजिये)!

अकारण बिजली के उपकरण मत चलाइये! शौकिया वाहन मत दौड़ाइये!!!!

*कूलर / ए सी का कम से कम उपयोग करने के लिये अपने घर हवादार बनवाइये /करवाइये!!!*

बेहतर जल-प्रबंधन कर पानी का दुरुपयोग रोकिये!!!!!!

*केवल “पौध रक्षा बांड” भरकर पौधे हमसे मुफ्त में लीजिये!*

कम  से कम उतने पेड़ तो लगाइये / लगवाइये जितने काटे जाने का कारण बने!

*आइये प्रकृति का कर्ज उतारें!!*

दूसरों को भी प्रेरित करें!!!

*मानवता धर्म निभायें!!!*

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लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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